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#हिंदीहैंहम: 'हिंदी ने बढ़ाया मान, हमें तो है अपनी मातृभाषा पर अभिमान'

Sat, 29 Aug 2020 01:23 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 29 Aug 2020 01:23 PM IST
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hindi hai hum: special story of Hindi teachers in educational institutions at gorakhpur
शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी के शिक्षकों ने मातृभाषा को लेकर रखे विचार। - फोटो : अमर उजाला।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जो जल्दी समझ में आती है। संवेदनाओं को व्यक्त करने का इससे सशक्त माध्यम और नहीं है। समाज में हिंदी को लेकर एक हीन भावना फैलाई गई है। यह विचार हैं उच्च शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी के शिक्षकों का, जिन्होंने न सिर्फ हिंदी में पढ़ाई की बल्कि रोजगार भी हासिल किया। उनका कहना है कि मातृभाषा के समाने कोई भाषा टिक नहीं सकती। हिंदी से ही हमारा मान बढ़ा है, हमें तो इस पर अभिमान है।

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गोरखपुर विश्वविद्यालय के आचार्य हिंदी विभाग के प्रो. विमलेश मिश्रा ने बताया कि साल 1996 में जब मैंने परास्नातक में हिंदी चुना तो मेरे मामा जी ने तंज कसा कि प्रवेश लेवे हिंदी में गइल ह। जब मैंने नेट उत्तीर्ण किया तो उन्हें पता नहीं था कि नेट क्या है? उनके दोस्तों ने बताया कि नेट उत्तीर्ण करने पर नौकरी पक्की समझिए। इसके बाद उनकी सोच बदली। कहने का तात्पर्य यह है कि समाज में हिंदी के प्रति हीन भावना बहुत पहले से मौजूद है। एक साजिश के तहत ऐसा किया गया। जबकि हिंदी ही वह भाषा है जो जल्दी समझ में आती है और जिसमें रोजगार की असीम संभावनाएं हैं। हिंदी के जरिए ही मेरा मान समाज में बढ़ा है। 

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सेंट एंड्रयूज कॉलेज हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुशील राय ने बताया कि हिंदी ऐसी भाषा है जिसमें हम जो लिखते हैं वही बोलते हैं। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। अंग्रेजी में कई अक्षर खामोश होते हैं। वहीं, हिंदी संवेदनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। मेरी रुचि हिंदी में बचपन से थी। हिंदी से स्नातक, परास्नातक और शोध किया। अब हिंदी विषय का शिक्षक हूं। मुझे इस भाषा पर गर्व है। हिंदी में रोजगार के बहुत सारे अवसर हैं। जितने भी विज्ञापन हैं वे सब हिंदी में हैं, क्योंकि यह भाषा आकर्षित करती है।
 
डीवीएनपीजी कॉलेज हिंदी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विभा सिंह ने बताया कि हिंदी से वास्तविकता का भाव प्रकट होता है। हिंदी के जरिए आंतरिक अनुभूति सामने आती है। जब स्नातक में विषय चुनना हुआ तो मैंने पहला विषय हिंदी ही चुना। हिंदी में ही शोध किया और अब शिक्षक भी बन गई। हिंदी में भी भविष्य है, इसमें रोजगार की संभावनाएं ज्यादा हैं। लेकिन हिंदी को बेहतर तरीके से समझना होगा। जहां तक नई पीढ़ी का सवाल है तो हम सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चों को हिंदी के प्रति प्रेरित करें।

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