#हिंदीहैंहम: गूंजी हिंदी विश्व में सपना हुआ साकार, थाईलैंड के मंच से हिंदी की जय जयकार
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‘गूंजी हिंदी विश्व में स्वप्न हुआ साकार, थाईलैंड के मंच से हिंदी की जय जयकार’। अमर उजाला की हिंदी हैं हम मुहिम के तहत शनिवार को आयोजित वेबिनार में ये लाइनें चरितार्थ हो उठीं। जब समुद्र के उस पार चार हजार किलोमीटर दूर बैठे थाईलैंड के प्रवासी भारतीय अभियान से जुड़े।
सबने कहा कि विश्व फलक पर हिंदी भाषा का तेजी से विकास हो रहा है। दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का तीसरा स्थान हो गया है। वह दिन दूर नहीं जब यह दूसरी भाषाओं को खुद में समाहित करने की खूबी के चलते पहले पायदान पर हो जाएगी। प्रवासी भारतीयों ने अमर उजाला की हिंदी हैं हम मुहिम की खुले कंठ से प्रशंसा की। कार्यक्रम का सजीव प्रसारण अमर उजाला के फेसबुक पेज और यू-ट्यूब चैनल पर भी किया गया।
दशकों से थाईलैंड में निवास करने वाले मनीषियों ने कहा कि किसी देश के नागरिक के लिए यह गौरव की बात है कि उसके देश की भाषा का प्रसार दूसरे देशों में हो रहा है। थाईलैंड और भारत में सांस्कृतिक समानताएं हैं। यही वजह है कि हिंदी भाषा को सीखने की ललक थाईलैंड के युवाओं में अधिक है। प्रत्येक वर्ष सैकड़ों की संख्या में थाई युवक भारत में जाकर वर्धा विश्वविद्यालय या केंद्रीय हिंदी संस्थान से हिंदी को सीख रहे हैं।
थाईलैंड के विश्वविद्यालय में भी हिंदी पढ़ाई जा रही है। यहां के युवाओं को पर्यटन के क्षेत्र में हिंदी भाषा ने कमाई का अच्छा जरिया दिया है। थाईलैंड से भारत आकर धार्मिक स्थलों का दर्शन करने वाले लोगों के ग्रुप से जुड़कर युवाओं ने इसे रोजगार से जोड़ दिया है।
इस मौके पर जीवन शैली रोग विशेषज्ञ डॉ. अलका गुप्ता ने कवयित्री महादेवी वर्मा को श्रद्धांजलि दी और काव्यपाठ किया। रंगसित विश्वविद्यालय थाईलैंड के शोधार्थी संजय कुमार ने कविता के माध्यम से हिंदी की महत्ता बताई। हिंदी परिषद थाईलैंड के संयोजक सुशील कुमार धानुका ने थाईलैंड की खूबसूरती पर कविता पाठ किया।
विदेश में रहने वाला हर भारतीय हिंदी भाषा का राजदूत
थाईलैंड से जीवन शैली रोग विशेषज्ञ डॉ. अलका गुप्ता ने बताया कि मैं जहां भी रही मेरी जड़ें मुझे मेेरी ताकत देती रहती हैं। विदेश में रहने वाला हर भारतीय हिंदी भाषा का राजदूत है। वश वह इसे जिंदा रखने की अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझे। हिंदी पिछड़ों की भाषा नहीं है, ये गौरव की अनुभूति है। जिसे इस अनुभूति से प्रेम है, उसके लिए हिंदी भाषा एक ताज है। थाईलैंड में हिंदी समृद्ध है, भारतीय दूतावास इसके प्रचार-प्रसार के लिए योजनाएं बनाता रहता है।
थाई युवाओं के लिए रोजगार का माध्यम है हिंदी
थाईलैंड से हिंदी परिषद संयोजक सुशील कुमार धानुका ने बताया कि पर्यटन के लिहाज से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में पर्यटक थाईलैंड से भारत आते हैं। इस दौरान एक दूसरे से संवाद बनाने और संस्कृति को समझने के लिए हिंदी अहम भूमिका निभाती है। इसके लिए हिंदी की जानकारी जरूरी है। थाई युवाओं ने इसे महसूस किया और हिंदी सीख कर वह पर्यटकों के साथ भारत जाने लगे। इस तरह उन्होंने इसे रोजगार से जोड़ दिया। आज थाईलैंड के कई विश्वविद्यालयों में 265 विद्यार्थी हिंदी भाषा का ज्ञान ले रहे हैं।
लगातार बढ़ रही हिंदी बोलने वालों की संख्या
थाईलैंड से चर्चित लेखिका डॉ. करुणा शर्मा ने बताया कि हर भारतीय के लिए गौरव की बात है कि हिंदी को दूसरे देश में सम्मान मिल रहा है। भारत और थाई के बीच सांस्कृतिक संबंध हैं। यहां के लोग बौद्ध अनुयायी होने की वजह से भारत में मौजूद बौद्ध स्थलों के दर्शन के लिए जाते हैं। हिंदी में स्नातक की डिग्री के लिए भी युवा भारत जाते हैं। वैवाहिक संबंध भी स्थापित हो रहे हैं, इसलिए हिंदी सीखना थाई लोगों के लिए जरूरी हो गया है।
पूरी दुनिया में चमक बिखेर रही हिंदी
थाईलैंड से ग्लोबल इंडियन इंटरनेशनल स्कूल शिक्षिका शिखा रस्तोगी ने बताया कि 13 साल से थाईलैंड के एकलौते सीबीएसई बोर्ड से संचालित स्कूल में हिंदी पढ़ा रही हूं। पूरी दुनिया में हिंदी अपनी चमक बिखेर रही है। थाईलैंड में हिंदी चलचित्र, वेश भूषा, भोजन, मंदिर, पर्व, भारत के बौद्ध स्थल और त्योहार लोगों को आकर्षित करते हैं। स्वेच्छा से लोग हिंदी से जुड़कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
अगली पीढ़ियों को भी हिंदी संस्कृति से रूबरू कराने की जरूरत
थाईलैंड से रंगसित विश्वविद्यालय शोधार्थी संजय कुमार ने बताया कि हिंदी महज भाषा नहीं, संस्कृति और संस्कार भी है। आज जरूरत है कि हिंदी की मशाल को हम अपनी दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक पहुंचाएं। अपने रीति रिवाज, संस्कृति के बारे में आने वाली पीढ़ियों को नहीं बताएंगे तो वह कभी इससे जुड़ाव महसूस नहीं कर सकेगी। मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा दिलों को जोड़ने का काम करती है। हमने देखा है कोई भारतीय विदेश में हो और अपनी भाषा में मदद मांगे तो कोई इनकार नहीं कर पाता है।
हिंदी भाषा के प्रति हर भारतीय के अंदर सम्मान
थाईलैंड से चियांगमाई विश्वविद्यालय के प्रो. सेकसन सवांगश्री ने बताया कि हिंदी भाषा के प्रति आदर और सम्मान हर भारतीय के अंदर कूटकूट कर भरा है। अध्यापन कार्य के दौरान मैंने इसे महसूूस किया है। इसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर इस भाषा को सीखा और आज विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहा हूं। हिंदी से लगाव के कारण थाई होने के बावजूद भारतीय संस्कृति, त्योहार और पर्व के बारे में पढ़ा। शुरूआत में मुश्किलों का सामना करना पड़ा मगर कभी हार नहीं मानी। भारत की यात्रा की है।
भारत जाकर शुद्ध हिंदी सीखना चाहते हैं थाई छात्र
हर भारतीय के लिए माथे की बिंदी है हिंदी
थाईलैंड से समाजसेविका शोभा सिंह ने बताया कि हिंदी समुद्र के इस पार से उस पार पहुंची है। हिंदी संवाद के लिए खुद को दूसरी भाषाओं में समाहित करती है। भारत तमाम भाषाओं वाला देश है। हिंदी एकजुटता व संस्कार देने का काम करती है। एक भारतीय होने के नाते हिंदी भाषा इस्तेमाल करती हूं और सामाजिक कार्यों से जुड़ा होने की वजह से लोगों को भी इस भाषा को स्वीकार करने की अलख जगाती हूं।