स्वास्थ्य अलर्ट: हल्का सा झटका और फिर दिल के दर्द से आराम, तकनीक से डॉक्टर कर रहे इलाज
शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक की मदद से कोरोनरी आर्टरी डिजीज के एडवांस चरण वाले मरीज का भी इलाज करना संभव हो पाता है, जिनकी धमनी में कैल्शियम एकत्र होने के कारण हार्ड ब्लॉकेज बन जाता है।
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दिल की धमनियों में जमे कैल्शियम की वजह से दर्द से परेशान हैं तो बस हल्का सा झटका झेलने को तैयार हो जाइए। अब इस मर्ज का इलाज धमनियों में जमे थक्के को मशीन के जरिए झटके से तोड़कर किया जा रहा है। इसे शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक कहते हैं। यह तकनीक काफी सफल और आसान है। इसमें मरीजों को न तो चीरा लगाया जाएगा, न ही कैल्शियम को हटाने के लिए किसी बड़े इंजेक्शन का प्रयोग। इससे मरीज को दर्द से तुरंत राहत मिल जाती है।
इस तकनीक का इस्तेमाल बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी के हृदय रोग विशेषज्ञों ने दो मरीजों पर सफलतापूर्वक किया है। इस तकनीक से इलाज थोड़ा महंगा जरूर है, पर डॉक्टरों का दावा है कि इसे दिल की बीमारी को आसानी से ठीक किया जा सकता है। शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक की मदद से कोरोनरी आर्टरी डिजीज के एडवांस चरण वाले मरीज का भी इलाज करना संभव हो पाता है, जिनकी धमनी में कैल्शियम एकत्र होने के कारण हार्ड ब्लॉकेज बन जाता है।
सुपर स्पेशियलिटी विभाग के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि यह तकनीक काफी सफल तो है लेकिन इलाज काफी महंगा है। इसमें इस्तेमाल होने वाली मशीनें बाहर से मंगानी पड़ती हैं। यह मशीन अभी न तो बीआरडी में है और न ही एसीजीपीजीआई में। एक मरीज पर करीब ढाई लाख रुपये का खर्चा आता है। जबकि सामान्य तौर पर एक स्टेंट डालने पर एक से डेढ़ लाख रुपये ही मरीजों के खर्च होते हैं।
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इस तरह किया जाता है तकनीक का इस्तेमाल
उन्होंने बताया कि शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक से मरीजों की जान बचाई गई है। मरीज का ब्लॉकेज दूर करके बिना चीरा के स्टेंट डाला गया है। यह तकनीक तेजी से बढ़ रही है।
डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव तकनीक बेहद सरल और सुरक्षित है। इसमें दिल की धमनियों में जमा कैल्शियम हटाने के लिए मशीन का उपयोग किया जाता है। हाथ या पैर की नस से दिल की धमनियों में जाने वाला पतला सा तार होता है। इसी तार से धमनियों में जमे ब्लॉकेज के अनुसार ही झटका दिया जाता है। झटके में कैल्शियम टूटकर बिखर जाता है। यही तार धमनियों को फुलाता है। इस दौरान ब्लॉकेज किए हुए धमनियों में स्टेंट (छल्ला) डाले जाते हैं।
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रोजाना भर्ती होते हैं 20 से ज्यादा मरीज
पिछले कुछ सालों से युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। कोरोना के बाद इसमें ज्यादा तेजी आई है। यही वजह है कि युवाओं को सलाह दी जाती है कि वह छह माह पर एक बार हृदय की जांच कराते रहें।