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खोज निकाली दवा : जेई के संक्रमण को रोकेगा...प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाएगा

Tue, 01 Oct 2024 06:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Updated Tue, 01 Oct 2024 06:09 AM IST
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Gorakhpur News: Medicine discovered: Will prevent JE infection...will also increase immunity
गोरखपुर। पूर्वांचल के लिए अभिशाप बने जापानी इंसेफेलाइटिस के वायरस के संक्रमण पर नियंत्रण की दवा डीडीयू गोरखपुर यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर और उनके शोधार्थी ने खोज निकाली है। दावा है कि उनका फार्मूला पूरी तरह से कारगर है और इंसानों के लिए सुरक्षित भी। लीवर में प्रोटीन के माध्यम से मस्तिष्क में जाकर दवा जेई के वायरस के वृद्धि को रोक देती है। साथ ही प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ा देगी। यह शोध पत्र विश्व की प्रतिष्ठित दो पत्रिकाओं एलजाइवर और फ्राेंटायर्स में प्रकाशित हुआ है। विश्वविद्यालय प्रशासन अब इसे पेटेंट कराने की तैयारी में है।
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यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग के शिक्षक डॉ. राकेश कुमार तिवारी के निर्देशन में विनय पांडेय ने नौ साल पहले वर्ष 2015-16 में जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस (जेईवी) पर शोध शुरू किया। उस समय जापानी इंसेफेलाइटिस का कहर पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश झेल रहा था। पहले जेई वायरस फिर उसकी सक्रियता रोकने के उपायों पर अध्ययन किया गया। भौतिकी विज्ञान के सिद्धांतों का प्रयोग कर मानव मस्तिष्क की संरचना पर काम करते हुए उसकी कंडीशन और मॉलीक्यूल पर अध्ययन हुआ। इसमें मानव मस्तिष्क में करीब 1000 से अधिक मॉलीक्यूल मिले। शोध के बाद पांच प्रमुख मॉलीक्यूल चिह्नित किए गए।
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इसमें पाया गया कि एनएस (नॉन स्ट्रक्चरल प्रोटीन) 3 व एनएस-5 की सक्रियता से मस्तिष्क में सूजन आने से दिमागी बुखार का रूप ले लेता है, जिसे जापानी इंसेफेलाइटिस के नाम से जाना जाता है। मानव शरीर में प्रवेश करने के बाद यह वायरस संरचनात्मक एवं असंरचनात्मक दोनों भागों में विभक्त हो जाता है। असंरचनात्मक प्रोटीन में दो सबसे विकसित एनएस-3 एवं एनएस-5 है। यह शोध पत्र एलजाइवर के कंप्यूटेशनल एंड थिरेटिकल केमेस्ट्री 2024 में प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक एडनोसिल डेरिवेटिक्स एज ए पोटेंशियल इंबाइर्स ऑफ एनएस-3 प्रोटिज ऑफ जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस (जेईवी): इन सिलिको मालीक्यूलर इनसाइट इन टू थिरेपटीक डिस्कवरी है।
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ऐसे करता है काम
प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार तिवारी का कहना है कि जेई में जो भी दवा लेते हैं उसका असर गर्दन पर व्याप्त ग्रंथि से ऊपर नहीं जा पाता है क्योंकि जेई के संक्रमण उसे रोक देते हैं। लेकिन जो दवा उन्होंने ईजाद की है वह लीवर में प्रोटीन में घुलकर मस्तिष्क तक पहुंच जाता है। दवा मिश्रित प्रोटीन शरीर में ही प्राकृतिक रूप से संश्लेषित एडिनोसाइल डेरीवेटिम के साथ जुड़कर जेई के वायरस की वृद्धि को रोकने में सक्षम है। दवा इस प्रोटीन के एक्टिव अवयवों के साथ आसानी से जुड़ जाता है। जो प्रोटीन के उत्प्रेरण क्षमता को समाप्त कर देता है और पूर्ण रूप से सुरक्षित है। इसके साथ ही यह मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता भी है।

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असुरक्षित थी चीन की ओर से निर्मित दवा
शोध में बताया गया है कि इस बीमारी में इलाज के लिए चीन की ओर से निर्मित एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से प्रमाणित एसए-14-14-2 नामक दवा जो जेई इंफेक्टेड मच्छर के लारवा से निकाल कर उसे क्षीण कर बनाया जाता है। यह दवा पूर्ण रूप से असुरक्षित एवं इनके साइड इफेक्ट अब सामने आ चुके हैं। भविष्य में इसे मूलरूप में परिवर्तित अथवा मानव के लिए स्वास्थ्य संबंधी दूसरी परेशानियां देने में समर्थ पाया गया है।
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