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Gorakhpur News: राजनीतिक लाभ के लिए सनातन विरोधी बन गए हैं कुछ दलों के नेता
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महाराणा प्रताप महाविद्यालय जंगल धूसड़ के कला संकाय द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में मह
एमपीपीजी कॉलेज में महाकुंभ पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास धाम अयोध्या के महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने शुभारंभ सत्र को किया संबोधित
बोले- आजादी के बाद सबसे बड़ा आंदोलन या धार्मिक पुनर्जागरण है प्रयागराज महाकुंभ
गंगा की शुद्धता पर सवाल उठाने वाले पहले अपनी शुद्धि प्रमाणित करें
गोरखपुर। सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास धाम अयोध्या के महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि महाकुंभ सनातन की अनादिकाल से चली आ रही परंपरा है। कुछ राजनीतिक दलों के नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए अनादिकाल से जारी इस परंपरा के विरोधी बन गए हैं। सनातन का तिरस्कार राष्ट्र और महाकुंभ में आए 60 करोड़ लोगों की भावना का तिरस्कार है। ऐसा करने वालों की राजनीति के ज्यादा दिन शेष नहीं हैं। राजनीतिक कारणों से महाकुंभ का तिरस्कार गहरी कुंठा का प्रतीक है।
महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण शनिवार को महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ के कला संकाय की ओर से ‘महाकुंभ 2025 : परंपरा, अनुष्ठान और महत्ता’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करने के बाद मीडिया से बातचीत कर रहे थे।
आचार्य ने कहा कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण महाकुंभ का तिरस्कार करने वालों के लिए आत्म समीक्षा का समय है। ऐसे लोग राजनीति पर, अपनी सीटों पर विमर्श करें तो बेहतर होगा। महाकुंभ पर विमर्श उनके सामर्थ्य का विषय नहीं है। पहले भी राजनेता महाकुंभ में आते थे, स्नान करते थे पर फोटो नहीं डालते थे। आज अनुकूल परिस्थितियां हैं तो फोटो भी डाल रहे हैं।
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उन्होंने संगोष्ठी में कहा कि प्रयागराज महाकुंभ को 1947 के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन या धार्मिक पुनर्जागरण कहा जाना चाहिए। 60 करोड़ लोग एक ही शहर की यात्रा पर हों, ऐसा पहली बार हुआ है। अतीत के कुंभ आयोजनों को देखें तो इस महाकुंभ में श्रद्धा का ज्वार अपूर्व है। पहले की सरकारों ने केंद्रीय कार्यक्रम मानकर कभी कुंभ को पुरस्कृत नहीं किया, लेकिन यह ऐसा पहला कुंभ है, जिसमें मुख्यमंत्री ने चप्पे-चप्पे पर जाकर व्यवस्था सुनिश्चित की।
गंगा की शुद्धता को लेकर सवाल उठने वालों के लिए उन्होंने कहा कि ऐसे लोग पहले अपनी शुद्धि प्रमाणित करें। यह ऐसे और असंतोष से भरे लोग हैं, जो मीडिया की नजर में आपदा में अपना अवसर खोज रहे हैं। गंगा की परीक्षा वाटर कंपोनेंट लेवल पर नहीं की जा सकती।
कुंभ अनेकता में एकता का प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम : प्रो. रेड्डी
उद्घाटन सत्र में विशिष्ट अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद संकाय के आचार्य प्रो. के. रामचंद्र रेड्डी ने कहा कि महाकुंभ अनेकता में एकता का एक प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम है। उन्होंने महाकुंभ को आयुर्वेद और ज्योतिष ग्रह विज्ञान की दृष्टि से समझाते हुए कहा कि चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में गंगा के प्रवाह का उपचारीय उल्लेख मिलता है। कहा कि सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं, उनसे मानव शरीर के लिए महत्वपूर्ण विटामिन डी की प्राप्ति होती है। बतौर विशिष्ट अतिथि त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल में संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. सुबोध कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ में गंगा परंपरा, यमुना अनुष्ठान और सरस्वती महत्ता के रूप में प्रवाहित होती हैं।
वैचारिक महाकुंभ का आयोजन है अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी : डॉ. प्रदीप
संगोष्ठी में आए अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ पर दुनिया अध्ययन कर रही है। कोई भी इससे अछूता नहीं रहा है। अनपढ़, पढ़े लिखे मूर्ख, विद्वान, वैज्ञानिक, आलोचक, पक्ष, निष्पक्ष सभी अपने-अपने तरीके से इसका अध्ययन और विमर्श कर रहे हैं। डॉ. राव ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ 2025 अपनी दिव्यता, भव्यता एवं सुव्यवस्था के लिए याद किया जाएगा। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में डॉ. प्रदीप कुमार राव की ओर से संपादित पुस्तक ‘सनातन परंपरा का महापर्व : महाकुंभ’ का विमोचन भी हुआ।
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सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास धाम अयोध्या के महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने शुभारंभ सत्र को किया संबोधित
बोले- आजादी के बाद सबसे बड़ा आंदोलन या धार्मिक पुनर्जागरण है प्रयागराज महाकुंभ
गंगा की शुद्धता पर सवाल उठाने वाले पहले अपनी शुद्धि प्रमाणित करें
गोरखपुर। सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास धाम अयोध्या के महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि महाकुंभ सनातन की अनादिकाल से चली आ रही परंपरा है। कुछ राजनीतिक दलों के नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए अनादिकाल से जारी इस परंपरा के विरोधी बन गए हैं। सनातन का तिरस्कार राष्ट्र और महाकुंभ में आए 60 करोड़ लोगों की भावना का तिरस्कार है। ऐसा करने वालों की राजनीति के ज्यादा दिन शेष नहीं हैं। राजनीतिक कारणों से महाकुंभ का तिरस्कार गहरी कुंठा का प्रतीक है।
महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण शनिवार को महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ के कला संकाय की ओर से ‘महाकुंभ 2025 : परंपरा, अनुष्ठान और महत्ता’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करने के बाद मीडिया से बातचीत कर रहे थे।
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आचार्य ने कहा कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण महाकुंभ का तिरस्कार करने वालों के लिए आत्म समीक्षा का समय है। ऐसे लोग राजनीति पर, अपनी सीटों पर विमर्श करें तो बेहतर होगा। महाकुंभ पर विमर्श उनके सामर्थ्य का विषय नहीं है। पहले भी राजनेता महाकुंभ में आते थे, स्नान करते थे पर फोटो नहीं डालते थे। आज अनुकूल परिस्थितियां हैं तो फोटो भी डाल रहे हैं।
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उन्होंने संगोष्ठी में कहा कि प्रयागराज महाकुंभ को 1947 के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन या धार्मिक पुनर्जागरण कहा जाना चाहिए। 60 करोड़ लोग एक ही शहर की यात्रा पर हों, ऐसा पहली बार हुआ है। अतीत के कुंभ आयोजनों को देखें तो इस महाकुंभ में श्रद्धा का ज्वार अपूर्व है। पहले की सरकारों ने केंद्रीय कार्यक्रम मानकर कभी कुंभ को पुरस्कृत नहीं किया, लेकिन यह ऐसा पहला कुंभ है, जिसमें मुख्यमंत्री ने चप्पे-चप्पे पर जाकर व्यवस्था सुनिश्चित की।
गंगा की शुद्धता को लेकर सवाल उठने वालों के लिए उन्होंने कहा कि ऐसे लोग पहले अपनी शुद्धि प्रमाणित करें। यह ऐसे और असंतोष से भरे लोग हैं, जो मीडिया की नजर में आपदा में अपना अवसर खोज रहे हैं। गंगा की परीक्षा वाटर कंपोनेंट लेवल पर नहीं की जा सकती।
कुंभ अनेकता में एकता का प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम : प्रो. रेड्डी
उद्घाटन सत्र में विशिष्ट अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद संकाय के आचार्य प्रो. के. रामचंद्र रेड्डी ने कहा कि महाकुंभ अनेकता में एकता का एक प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम है। उन्होंने महाकुंभ को आयुर्वेद और ज्योतिष ग्रह विज्ञान की दृष्टि से समझाते हुए कहा कि चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में गंगा के प्रवाह का उपचारीय उल्लेख मिलता है। कहा कि सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं, उनसे मानव शरीर के लिए महत्वपूर्ण विटामिन डी की प्राप्ति होती है। बतौर विशिष्ट अतिथि त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल में संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. सुबोध कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ में गंगा परंपरा, यमुना अनुष्ठान और सरस्वती महत्ता के रूप में प्रवाहित होती हैं।
वैचारिक महाकुंभ का आयोजन है अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी : डॉ. प्रदीप
संगोष्ठी में आए अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ पर दुनिया अध्ययन कर रही है। कोई भी इससे अछूता नहीं रहा है। अनपढ़, पढ़े लिखे मूर्ख, विद्वान, वैज्ञानिक, आलोचक, पक्ष, निष्पक्ष सभी अपने-अपने तरीके से इसका अध्ययन और विमर्श कर रहे हैं। डॉ. राव ने कहा कि प्रयागराज महाकुंभ 2025 अपनी दिव्यता, भव्यता एवं सुव्यवस्था के लिए याद किया जाएगा। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में डॉ. प्रदीप कुमार राव की ओर से संपादित पुस्तक ‘सनातन परंपरा का महापर्व : महाकुंभ’ का विमोचन भी हुआ।