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Gorakhpur News: आध्यात्मिकता और नीतिशास्त्र पर आधारित है भारतीय रणनीतिक संस्कृति
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एमपी पीजी कॉलेज में महंत अवेद्यनाथ स्मृति सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला का दूसरा दिन
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा एवं स्त्रातजिक अध्यन विभाग के प्रोफेसर हर्ष कुमार सिन्हा ने कहा कि रणनीतिक संस्कृति का तात्पर्य केवल युद्धकला या शक्ति-प्रदर्शन नहीं है। यह एक राष्ट्र की नीति, धर्म, मूल्य और व्यवहार की वह परंपरा है, जो उसके सामरिक, राजनयिक और सांस्कृतिक निर्णयों को दिशा देती है। भारत की ज्ञान परंपरा में यह रणनीतिक दृष्टि सदैव धर्म, नीति और लोककल्याण पर आधारित रही है।
प्रो. सिन्हा महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ में ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की स्मृति में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन ''''''''भारतीय ज्ञान परंपरा में रणनीतिक संस्कृति'''''''' विषय पर बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि हम वेद और उपनिषद को देखें तो वो हमें बताते हैं कि वास्तविक विजय केवल शस्त्र से नहीं बल्कि आत्मबल और संयम से होती है। अलग-अलग कालखंडों में रणनीतिक संस्कृति विभिन्न रूपों में देखी गई है। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने धर्म और नीति पर आधारित रणनीति से आदर्श स्थापित किया। महाभारत में श्रीकृष्ण ने हमें सिखाया कि कभी-कभी धर्म की रक्षा के लिए रणनीतिक लचीलापन आवश्यक होता है। आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र भारतीय रणनीतिक संस्कृति का शास्त्रीय स्वरूप है, जिसमें युद्धनीति, गुप्तचर, कूटनीति और अर्थनीति का अद्भुत समन्वय मिलता है। भारत की विदेश नीति और रक्षा नीति में यह स्पष्ट दिखता है कि शक्ति का प्रयोग केवल आत्मरक्षा और विश्व कल्याण के लिए ही होना चाहिए।
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भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता लोककल्याण और शांति
अध्यक्षता करते हुए भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. विजय चौधरी ने कहा कि भारतीय रणनीतिक संस्कृति की जड़ें वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और चाणक्य नीति जैसे ग्रंथों में गहराई से स्थापित हैं। इसी ज्ञान परंपरा पर महंत अवेद्यनाथ का पूरा जीवन आधारित था। संचालन विवेक विश्वकर्मा ने किया।
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गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा एवं स्त्रातजिक अध्यन विभाग के प्रोफेसर हर्ष कुमार सिन्हा ने कहा कि रणनीतिक संस्कृति का तात्पर्य केवल युद्धकला या शक्ति-प्रदर्शन नहीं है। यह एक राष्ट्र की नीति, धर्म, मूल्य और व्यवहार की वह परंपरा है, जो उसके सामरिक, राजनयिक और सांस्कृतिक निर्णयों को दिशा देती है। भारत की ज्ञान परंपरा में यह रणनीतिक दृष्टि सदैव धर्म, नीति और लोककल्याण पर आधारित रही है।
प्रो. सिन्हा महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ में ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की स्मृति में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन ''''''''भारतीय ज्ञान परंपरा में रणनीतिक संस्कृति'''''''' विषय पर बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि हम वेद और उपनिषद को देखें तो वो हमें बताते हैं कि वास्तविक विजय केवल शस्त्र से नहीं बल्कि आत्मबल और संयम से होती है। अलग-अलग कालखंडों में रणनीतिक संस्कृति विभिन्न रूपों में देखी गई है। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने धर्म और नीति पर आधारित रणनीति से आदर्श स्थापित किया। महाभारत में श्रीकृष्ण ने हमें सिखाया कि कभी-कभी धर्म की रक्षा के लिए रणनीतिक लचीलापन आवश्यक होता है। आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र भारतीय रणनीतिक संस्कृति का शास्त्रीय स्वरूप है, जिसमें युद्धनीति, गुप्तचर, कूटनीति और अर्थनीति का अद्भुत समन्वय मिलता है। भारत की विदेश नीति और रक्षा नीति में यह स्पष्ट दिखता है कि शक्ति का प्रयोग केवल आत्मरक्षा और विश्व कल्याण के लिए ही होना चाहिए।
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भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता लोककल्याण और शांति
अध्यक्षता करते हुए भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. विजय चौधरी ने कहा कि भारतीय रणनीतिक संस्कृति की जड़ें वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और चाणक्य नीति जैसे ग्रंथों में गहराई से स्थापित हैं। इसी ज्ञान परंपरा पर महंत अवेद्यनाथ का पूरा जीवन आधारित था। संचालन विवेक विश्वकर्मा ने किया।
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