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Gorakhpur News: शुगर के मरीज का यूरिक एसिड बढ़ा तो न्यूरो की बीमारी का खतरा अधिक
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बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 392 मरीजों पर किया गया अध्ययन, निष्कर्ष से मिलेगी इलाज में मदद
यूरिक एसिड टेस्ट से बीमारी का पता लगाकर किया जा सकेगा इलाज
गोरखपुर। मधुमेह (शुगर) के मरीजों में यदि यूरिक एसिड का स्तर अधिक है, तो उनमें डायबिटिक ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी (डीएएन) बीमारी होने का खतरा ज्यादा रहता है। न्यूरो से जुड़ी यह गंभीर बीमारी हृदय, पाचन तंत्र, मूत्र मार्ग और अन्य स्वायत्त कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग में 392 मरीजों पर किए गए अध्ययन में यह जानकारी मिली है। इन मरीजों में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थीं। महिला मरीजों में जिनको डीएएन की समस्या थी, उनका यूरिक एसिड स्तर औसतन 7.78 मिलीग्राम/डेसीलीटर था। जिन्हें यह बीमारी नहीं थी, उनमें यह स्तर 5.57 मिलीग्राम/डेसीलीटर था। पुरुष मरीजों में डीएएन का स्तर 8.12 मिलीग्राम/डेसीलीटर और बिना डीएएन वाले मरीजों में 6.24 मिलीग्राम/डेसीलीटर पाया गया।
यह अध्ययन करने वाले डॉ. रूमाला और शोध निर्देशक डॉ. राजकिशोर ने बताया कि इस डेटा से स्पष्ट होता है कि यूरिक एसिड का स्तर जितना अधिक होगा, डायबिटिक ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी (डीएएन) बीमारी होने की आशंका भी उतनी ही ज्यादा होगी। उनका मानना है कि यदि यूरिक एसिड की नियमित जांच की जाए, तो मधुमेह के मरीजों में न्यूरोपैथी का खतरा समय रहते पहचाना जा सकता है ताकि उचित इलाज समय पर शुरू किया जा सके।
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यह अध्ययन डायबिटिक मरीजों की दीर्घकालिक देखभाल में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इसको राष्ट्रीय स्तर पर भी मंजूरी मिली है। डॉ. रूमाला ने इसे एक राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया था, जहां इसके लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला।
अब मोटापे पर होगा शोध
बीआरडी मेडिकल कॉलेज को मोटापे के कारण और इलाज पर शोध करने के लिए एक प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली गई है। डॉ. राजकिशोर ने बताया कि मोटापा केवल खानपान और खराब जीवन शैली नहीं बल्कि एक प्रकार का शारीरिक रोग भी है। कुछ लोगों को इसकी वजह से पूरा जीवन अत्यंत तकलीफ के साथ बिताना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर मोटापा के लिए जिम्मेदार कारकों की शोध करेंगे। इस शोध को पूरा करने के लिए आईसीएमआर से आर्थिक व तकनीकी सहयोग भी मिलेगा।
वर्जन
बीआरडी मेडिकल कॉलेज को शोध संस्थान के रूप में विकसित करने के लिए आईसीएमआर और एम्स जैसे बड़े संस्थानों से आर्थिक व तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में जल्द ही कुछ और नए विषयों पर शोध कार्य होंगे।
-डॉ. रामकुमार जायसवाल, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कॉलेज
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यूरिक एसिड टेस्ट से बीमारी का पता लगाकर किया जा सकेगा इलाज
गोरखपुर। मधुमेह (शुगर) के मरीजों में यदि यूरिक एसिड का स्तर अधिक है, तो उनमें डायबिटिक ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी (डीएएन) बीमारी होने का खतरा ज्यादा रहता है। न्यूरो से जुड़ी यह गंभीर बीमारी हृदय, पाचन तंत्र, मूत्र मार्ग और अन्य स्वायत्त कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग में 392 मरीजों पर किए गए अध्ययन में यह जानकारी मिली है। इन मरीजों में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थीं। महिला मरीजों में जिनको डीएएन की समस्या थी, उनका यूरिक एसिड स्तर औसतन 7.78 मिलीग्राम/डेसीलीटर था। जिन्हें यह बीमारी नहीं थी, उनमें यह स्तर 5.57 मिलीग्राम/डेसीलीटर था। पुरुष मरीजों में डीएएन का स्तर 8.12 मिलीग्राम/डेसीलीटर और बिना डीएएन वाले मरीजों में 6.24 मिलीग्राम/डेसीलीटर पाया गया।
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यह अध्ययन करने वाले डॉ. रूमाला और शोध निर्देशक डॉ. राजकिशोर ने बताया कि इस डेटा से स्पष्ट होता है कि यूरिक एसिड का स्तर जितना अधिक होगा, डायबिटिक ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी (डीएएन) बीमारी होने की आशंका भी उतनी ही ज्यादा होगी। उनका मानना है कि यदि यूरिक एसिड की नियमित जांच की जाए, तो मधुमेह के मरीजों में न्यूरोपैथी का खतरा समय रहते पहचाना जा सकता है ताकि उचित इलाज समय पर शुरू किया जा सके।
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यह अध्ययन डायबिटिक मरीजों की दीर्घकालिक देखभाल में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इसको राष्ट्रीय स्तर पर भी मंजूरी मिली है। डॉ. रूमाला ने इसे एक राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया था, जहां इसके लिए उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला।
अब मोटापे पर होगा शोध
बीआरडी मेडिकल कॉलेज को मोटापे के कारण और इलाज पर शोध करने के लिए एक प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली गई है। डॉ. राजकिशोर ने बताया कि मोटापा केवल खानपान और खराब जीवन शैली नहीं बल्कि एक प्रकार का शारीरिक रोग भी है। कुछ लोगों को इसकी वजह से पूरा जीवन अत्यंत तकलीफ के साथ बिताना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर मोटापा के लिए जिम्मेदार कारकों की शोध करेंगे। इस शोध को पूरा करने के लिए आईसीएमआर से आर्थिक व तकनीकी सहयोग भी मिलेगा।
वर्जन
बीआरडी मेडिकल कॉलेज को शोध संस्थान के रूप में विकसित करने के लिए आईसीएमआर और एम्स जैसे बड़े संस्थानों से आर्थिक व तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है। मेडिकल कॉलेज में जल्द ही कुछ और नए विषयों पर शोध कार्य होंगे।
-डॉ. रामकुमार जायसवाल, प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कॉलेज