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बेतिया एस्टेट : दो बार पहले भी कोर्ट में जा चुका है जमीनों की बेदखली का मामला
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वाराणसी के अशोक सिंह ने खुद को बेतिया एस्टेट का उत्तराधिकारी बताते हुए भेजा था नोटिस
सिविल कोर्ट में भी प्रशासन की ओर से दायर हुआ केस, दोनों ही मामलों में लोगों को कोर्ट ने दी थी राहत
गोरखपुर। बेतियाहाता में बेतिया एस्टेट की जमीन पर रह रहे 41 परिवारों को पहले भी दो बार कोर्ट से नोटिस मिल चुका है। पहली बार 1984 में सिविल कोर्ट से और दूसरी बार खुद को बेतिया एस्टेट का लीगल वारिस बताने वाले वाराणसी के अशोक कुमार सिंह ने दिया था। लेकिन, दोनों बार कोर्ट ने लोगों को राहत दी। बिहार सरकार से नियुक्त प्रशासक की ओर से बेदखली का केस किए जाने के बाद अब एक बार फिर इन परिवारों के सामने संकट खड़ा हो गया।
यहां के निवासी अच्छेलाल ने बताया कि वर्ष 1984 में प्रशासन की ओर से उन्हें इस भूमि से हटाने का प्रयास किया गया था। इसके विरुद्ध सिविल कोर्ट गोरखपुर में वाद संख्या 123/1984 (खुशियाल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) दाखिल किया गया था। इस केस में अदालत ने निवासियों को स्थायी रूप से उजाड़े जाने से संरक्षण प्रदान किया था।
इसी प्रकार वर्ष 2021 में वाराणसी के अशोक कुमार सिंह की ओर से खुद को बेतिया एस्टेट का उत्तराधिकारी बताते हुए नोटिस भेजा गया, जिसके विरुद्ध वाद संख्या 91/2021 (खुशियाल बनाम अशोक कुमार सिंह व अन्य) दाखिल किया गया। इसमें भी स्थगन आदेश प्राप्त है।
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निवासियाें का आरोप है कि बेतियाहाता क्षेत्र में आराजी संख्या 138 पर वर्षों से निवास कर रहे लगभग 40 अनुसूचित जाति के परिवारों को ही नोटिस जारी किया गया है, जबकि इसी क्षेत्र में स्थित बड़ी-बड़ी इमारतों, कॉम्प्लेक्सों और अस्पतालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि यह कार्रवाई चयनात्मक और भेदभावपूर्ण है। खुशियाल कहते हैं, जिन लोगों पर केस किया गया है, उनके पूर्वज बेतिया एस्टेट के कारिंदे थे, जो आजादी से पहले अस्तबल, खेती, सफाई आदि का कार्य करते थे। आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में इनके पूर्वजों ने मतदान भी किया था, जिसके दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद आज तक इनके नाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं हुए। उन्होंने बिहार सरकार की ओर से पारित बेतिया स्टेट संपत्ति अधिग्रहण अधिनियम को असंवैधानिक और अव्यवहारिक बताया। पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी ने कहा कि शनिवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जब भी कानूनी प्रक्रिया के तहत निवासियों को बुलाया जाएगा, वे संगठित रूप से और कानून के दायरे में रहते हुए अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे।
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सिविल कोर्ट में भी प्रशासन की ओर से दायर हुआ केस, दोनों ही मामलों में लोगों को कोर्ट ने दी थी राहत
गोरखपुर। बेतियाहाता में बेतिया एस्टेट की जमीन पर रह रहे 41 परिवारों को पहले भी दो बार कोर्ट से नोटिस मिल चुका है। पहली बार 1984 में सिविल कोर्ट से और दूसरी बार खुद को बेतिया एस्टेट का लीगल वारिस बताने वाले वाराणसी के अशोक कुमार सिंह ने दिया था। लेकिन, दोनों बार कोर्ट ने लोगों को राहत दी। बिहार सरकार से नियुक्त प्रशासक की ओर से बेदखली का केस किए जाने के बाद अब एक बार फिर इन परिवारों के सामने संकट खड़ा हो गया।
यहां के निवासी अच्छेलाल ने बताया कि वर्ष 1984 में प्रशासन की ओर से उन्हें इस भूमि से हटाने का प्रयास किया गया था। इसके विरुद्ध सिविल कोर्ट गोरखपुर में वाद संख्या 123/1984 (खुशियाल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) दाखिल किया गया था। इस केस में अदालत ने निवासियों को स्थायी रूप से उजाड़े जाने से संरक्षण प्रदान किया था।
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इसी प्रकार वर्ष 2021 में वाराणसी के अशोक कुमार सिंह की ओर से खुद को बेतिया एस्टेट का उत्तराधिकारी बताते हुए नोटिस भेजा गया, जिसके विरुद्ध वाद संख्या 91/2021 (खुशियाल बनाम अशोक कुमार सिंह व अन्य) दाखिल किया गया। इसमें भी स्थगन आदेश प्राप्त है।
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निवासियाें का आरोप है कि बेतियाहाता क्षेत्र में आराजी संख्या 138 पर वर्षों से निवास कर रहे लगभग 40 अनुसूचित जाति के परिवारों को ही नोटिस जारी किया गया है, जबकि इसी क्षेत्र में स्थित बड़ी-बड़ी इमारतों, कॉम्प्लेक्सों और अस्पतालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि यह कार्रवाई चयनात्मक और भेदभावपूर्ण है। खुशियाल कहते हैं, जिन लोगों पर केस किया गया है, उनके पूर्वज बेतिया एस्टेट के कारिंदे थे, जो आजादी से पहले अस्तबल, खेती, सफाई आदि का कार्य करते थे। आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में इनके पूर्वजों ने मतदान भी किया था, जिसके दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद आज तक इनके नाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं हुए। उन्होंने बिहार सरकार की ओर से पारित बेतिया स्टेट संपत्ति अधिग्रहण अधिनियम को असंवैधानिक और अव्यवहारिक बताया। पार्षद विश्वजीत त्रिपाठी ने कहा कि शनिवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जब भी कानूनी प्रक्रिया के तहत निवासियों को बुलाया जाएगा, वे संगठित रूप से और कानून के दायरे में रहते हुए अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे।