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Gorakhpur News: रहें होशियार...बाजार में रेडीमेड बूंदी से बने लड्डू की भरमार

Thu, 02 Oct 2025 01:23 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 02 Oct 2025 01:23 AM IST
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Gorakhpur News: Be careful...the market is full of readymade laddus made from boondi.
लिवर को देगा झटका: त्योहारों पर मिलावटी मिठाई का धंधा चरम पर
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शीरे में डालकर तैयार कर देते हैं लड्डू, 150 से 200 रुपये किलो में बिकता है
कलर और प्रिजरवेटिव की वजह से बढ़ जाता है लिवर पर खतरा

गोरखपुर। त्योहार नजदीक आते ही बाजार में मिठाइयों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इसी मांग का फायदा उठाते हुए मिलावटखोर सक्रिय हो गए हैं। कानपुर, पडरौना और आसपास के जिलों से बड़े पैमाने पर मिलावटी खोआ, बूंदी, सोनपापड़ी और इमरती की सप्लाई हो रही है। इन मिठाइयों की सचाई चौंकाने वाली है। ऐसा इसलिए कि इनमें न तो शुद्ध सामग्री होती है और न ही स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है।
बूंदी से बने लड्डू की खपत जिले में रोजाना 80 टन के करीब है। सूत्रों के अनुसार, कानपुर से बड़ी मात्रा में खोआ और बूंदी भेजी जा रही है। खास बात यह है कि यहां तैयार बूंदी बोरी में भरकर आती है जिसमें बेसन की जगह मिलावटी रंग और केमिकल मिलाए जाते हैं। टाट्राजीन, लाल और पीला सिंथेटिक कलर साथ ही प्रिजरवेटिव मिलाकर इसे लंबे समय तक खराब होने से बचाया जाता है।
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इस बूंदी की कीमत मात्र 70 रुपये किलो होती है जिसे स्थानीय दुकानदार शीरे में डालकर लड्डू तैयार कर देते हैं और 150 से 200 रुपये किलो तक बेचते हैं। त्योहारों में इन लड्डुओं की खपत इतनी अधिक होती है कि रोजाना 80 टन तक बूंदी खप जाती है। बड़ी दुकानों तक पर यह मिठाई बिक जाती है। स्वाद और सटावट बढ़ाने के लिए इसमें ड्राई फ्रूट्स और खीरे के बीज डाल दिए जाते हैं ताकि ग्राहक को शंका न हो।
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पांच टन है सोनपापड़ी की खपत
इमरती का कारोबार भी कम नहीं है। कुशीनगर के पडरौना से यह मिठाई ड्राई रूप में आती है जिसे स्थानीय स्तर पर गर्म तेल और शीरे में डालकर फिर से तैयार किया जाता है। असल में यह इमरती कई महीने पहले तैयार की जाती है और प्रिजरवेटिव लगाकर स्टोर कर दी जाती है। बाजार में आते-आते यह महीनों पुरानी मिठाई हो जाती है। इसी तरह सोनपापड़ी भी गोरखपुर, पडरौना और बलिया के बाजारों में बिना ब्रांड नाम के पैकेट में बिकती है। रोजाना करीब पांच टन सोनपापड़ी की खपत बताई जाती है। नामी ब्रांड का लेबल न होने के बावजूद लोकल डिमांड इतनी अधिक है कि यह मिठाई धड़ल्ले से बिक जाती है।


पाचन तंत्र पर पड़ता है असर
ऐसी मिलावटी और केमिकल युक्त मिठाइयों का असर सीधा लोगों की सेहत पर पड़ता है। जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. बीके सुमन का कहना है कि सिंथेटिक कलर जैसे टाट्राजीन और मेटानिल येलो, जिनका प्रयोग मिलावटी बूंदी और लड्डुओं में होता है, शरीर के लिए जहरीले होते हैं। यह रंग धीरे-धीरे लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचाते हैं और लंबे समय तक सेवन करने पर कैंसर का खतरा भी बढ़ा देते हैं। इसके अलावा मिठाइयों में मिलाए गए प्रिजरवेटिव और सस्ते तेल पाचन तंत्र पर बुरा असर डालते हैं। बच्चों और बुजुर्गों को अक्सर दस्त, पेट दर्द और एलर्जी की समस्या हो जाती है। इमरती और सोनपापड़ी जैसे उत्पादों में महीनों पुरानी सामग्री का प्रयोग शरीर में फूड पॉइजनिंग की आशंका भी बढ़ा देता है।



बिना ब्रांड या लेबल से बचें
सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा डॉ. सुधीर कुमार सिंह का कहना है कि त्योहारों पर मिठाई खरीदते समय बिना ब्रांड या बिना लेबल वाले उत्पादों से बचें। इनकी जगह भरोसेमंद ब्रांडेड पैकिंग लेना ज्यादा सुरक्षित है। शक होने पर मिठाई की जांच के लिए ‘फूड सेफ्टी’ हेल्पलाइन पर शिकायत भी की जा सकती है।
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