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Gorakhpur News: गर्भ में ही चली गई आंखों की रोशनी, सर्जरी से रौशन हुई 25 बच्चों की दुनिया
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एम्स : गर्भावस्था में संक्रमण और आनुवंशिक कारणों से कम उम्र में बच्चों में हो रहा मोतियाबिंद
गोरखपुर। एम्स के नेत्र रोग विभाग में 25 बच्चों की आंखों की रोशनी सर्जरी कर लौटाई गई है। ये बच्चे कम उम्र में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) से पीड़ित थे। डॉक्टरों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाले संक्रमण या आनुवंशिक कारणों से कम उम्र में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) की समस्या देखने को मिल रही है। सर्जरी करके बच्चों की आंखों की रोशनी वापस लाई गई है।
एम्स के नेत्र रोग विभाग में एक साल में छह से 10 साल की उम्र के 50 से अधिक बच्चों में मोतियाबिंद के मामले सामने आए हैं। गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक टॉक्सोप्लाज्मोसिस, रूबेला, चिकनपॉक्स या हर्पीस जैसे संक्रमण रहने पर गर्भ में पल रहे शिशुओं की आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कुछ बच्चों में यह आनुवंशिक भी होता है, माता- पिता में से किसी को भी बचपन में मोतियाबिंद होने पर यह बच्चों में भी हो सकता है। एम्स में इलाज कराने आए बच्चों की प्रारभिंक जांच में दोनों कारण सामने आए हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों में इस समस्या की पहचान करना अक्सर कठिन होता है, खासकर तब जब केवल एक आंख प्रभावित हो। एक आंख की दृष्टि कमजोर होने पर दूसरी आंख पर निर्भर रहते हैं, जिससे माता-पिता को देर से समस्या का अहसास होता है। नवजात शिशुओं की समय पर नेत्र जांच और स्क्रीनिंग कराई जाए तो इस बीमारी का जल्दी पता लगाया जा सकता है। यदि बच्चा बार-बार आंखें मले, रोशनी में आंखें सिकोड़े, उसकी आंखों में सफेद धब्बे नजर दिखाई दे तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
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रेड रिफ्लेक्स टेस्ट से हो जाती है शुरुआती पहचान
नेत्र रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ऋचा अग्रवाल ने बताया कि जन्म के समय नवजात शिशु की आंखों की जांच बेहद आवश्यक है। रेड रिफ्लेक्स टेस्ट से बच्चों में मोतियाबिंद की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है। उन्होंने बताया कि समय पर ऑपरेशन से बच्चों की रोशनी बचाई जा सकती है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच, डॉक्टर की सलाह अनुसार टीकाकरण और संक्रमण से बचाव के लिए साफ-सफाई और पौष्टिक आहार का ध्यान देना जरूरी है।
नवजात बच्चों में जल्द हो सकता है ऑपरेशन
नवजात शिशुओं के मोतियाबिंद का ऑपरेशन आठ सप्ताह की उम्र में भी किया जा सकता है। एम्स में सबसे कम उम्र में छह महीने के बच्चे के दोनों आखों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया गया है। दोनों आंखें प्रभावित होने पर एक आंख की सर्जरी करने के बाद जल्द से जल्द दूसरी आंख का भी इलाज कराना आवश्यक होता है।
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गोरखपुर। एम्स के नेत्र रोग विभाग में 25 बच्चों की आंखों की रोशनी सर्जरी कर लौटाई गई है। ये बच्चे कम उम्र में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) से पीड़ित थे। डॉक्टरों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाले संक्रमण या आनुवंशिक कारणों से कम उम्र में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) की समस्या देखने को मिल रही है। सर्जरी करके बच्चों की आंखों की रोशनी वापस लाई गई है।
एम्स के नेत्र रोग विभाग में एक साल में छह से 10 साल की उम्र के 50 से अधिक बच्चों में मोतियाबिंद के मामले सामने आए हैं। गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक टॉक्सोप्लाज्मोसिस, रूबेला, चिकनपॉक्स या हर्पीस जैसे संक्रमण रहने पर गर्भ में पल रहे शिशुओं की आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कुछ बच्चों में यह आनुवंशिक भी होता है, माता- पिता में से किसी को भी बचपन में मोतियाबिंद होने पर यह बच्चों में भी हो सकता है। एम्स में इलाज कराने आए बच्चों की प्रारभिंक जांच में दोनों कारण सामने आए हैं।
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डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों में इस समस्या की पहचान करना अक्सर कठिन होता है, खासकर तब जब केवल एक आंख प्रभावित हो। एक आंख की दृष्टि कमजोर होने पर दूसरी आंख पर निर्भर रहते हैं, जिससे माता-पिता को देर से समस्या का अहसास होता है। नवजात शिशुओं की समय पर नेत्र जांच और स्क्रीनिंग कराई जाए तो इस बीमारी का जल्दी पता लगाया जा सकता है। यदि बच्चा बार-बार आंखें मले, रोशनी में आंखें सिकोड़े, उसकी आंखों में सफेद धब्बे नजर दिखाई दे तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
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रेड रिफ्लेक्स टेस्ट से हो जाती है शुरुआती पहचान
नेत्र रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ऋचा अग्रवाल ने बताया कि जन्म के समय नवजात शिशु की आंखों की जांच बेहद आवश्यक है। रेड रिफ्लेक्स टेस्ट से बच्चों में मोतियाबिंद की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है। उन्होंने बताया कि समय पर ऑपरेशन से बच्चों की रोशनी बचाई जा सकती है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच, डॉक्टर की सलाह अनुसार टीकाकरण और संक्रमण से बचाव के लिए साफ-सफाई और पौष्टिक आहार का ध्यान देना जरूरी है।
नवजात बच्चों में जल्द हो सकता है ऑपरेशन
नवजात शिशुओं के मोतियाबिंद का ऑपरेशन आठ सप्ताह की उम्र में भी किया जा सकता है। एम्स में सबसे कम उम्र में छह महीने के बच्चे के दोनों आखों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया गया है। दोनों आंखें प्रभावित होने पर एक आंख की सर्जरी करने के बाद जल्द से जल्द दूसरी आंख का भी इलाज कराना आवश्यक होता है।