Exclusive: खेतों में डाली यूरिया से निकल रही गैस पर्यावरण के लिए खतरनाक...मित्र कीट हो रहे विलुप्त
वर्मी कंपोस्ट एवं वर्मीवाश में सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, नाइट्रोजन, खनिज लवण, एंजाइम, हॉर्मोंस तथा विटामिन के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक गुण समुचित मात्रा में पाया जाता है। इसका उत्पादन तथा प्रयोग बहुत ही आसन तथा कम खर्चीला होने के कारण छोटे किसानों के लिए यह एक वरदान सिद्ध हो रहा है।
विस्तार
रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। रासायनिक उर्वरकों से जहां खेतों की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है, वहीं सिंचाई के लिए पानी की भी कमी होती जा रही। खेत में डाली गई यूरिया से ग्रीन हाउस गैस, नाइट्रस ऑक्साइड से जैसी खतरनाक गैस निकल रहीं हैं, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। मित्र कीट तो मर ही रहे हैं, ओजोन परत को भी नुकसान पहुंच रहा है।
गोविवि के प्राणि विज्ञान विभाग की वर्मी बायोटेक्नोलॉजी प्रयोगशाला में प्रो. केशव सिंह के निर्देशन में हुए शोध में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोध में रासायनिक उर्वरक और वर्मी कंपोस्ट को लेकर खेत में फसल पर अलग-अलग अध्ययन किया गया। जिसमें पाया गया कि रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग वातावरणीय प्रदूषण तथा मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करने के साथ-साथ जीव जंतुओं की अस्तित्व के लिए भी खतरा बन गया है। इनका कुप्रभाव फसलों के लिए उपयोगी सूक्ष्म जीवों पर पड़ रहा है। मसलन, खेत मित्र कीट केंचुआ, रेड लेडी बर्ड बीटल, कीट मेंटिस, जिओकारिस कीट, मकड़ी आदि अब खत्म होती जा रही हैं।
इसे भी पढ़ें: गोरक्षनगरी से लखनऊ के रास्ते कुंभनगरी तक दौड़ेगी वंदेभारत, रेलवे बोर्ड ने दी विस्तार की मंजूरी
रासायनिक खाद व कीटनाशक के प्रयोग से होने वाले नुकसान
- जल, मृदा और वायु प्रदूषण का है बड़ा कारक
- मिट्टी की उर्वरा शक्ति हो रही क्षीण
- मिट्टी के क्षारीय होने से घट रही पैदावार
- यूरिया व डीएपी जैसे उर्वरक के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी से लोप हो रहे प्राकृतिक तत्व
- मिट्टी के कणों में पानी संग्रह की क्षमता हो रही कम, अधिक सिंचाई की आवश्यकता
- यूरिया का बीज के साथ सीधा संपर्क होने से अंकुरण दर में भी होती है कमी
- रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से दलहन फसलों की ग्रंथि निर्माण व वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर भी विपरीत प्रभाव
- यूरिया के इस्तेमाल से ग्रीन हाउस गैस, नाइट्रस ऑक्साइड, वायुमंडल में उपस्थित ओजोन परत को भी पहुंचा रहा नुकसान
- रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से उत्पादों में भी विषाक्तता बढ़ रही, कई तरह की बीमारी बढ़ रही
- कीटनाशकों के इस्तमाल ने खेतों से किसानों के मित्र जीव कहे जाने वाले कीटों को भी गायब कर दिया, ये जीव जैविक क्रियाओं द्वारा मिट्टी को उर्वरा बनाये रखने में मददगार होते है।
इसे भी पढ़ें: पिता के निधन के बाद अभिभावक की तरह बने सहारा, सुब्रत रॉय ने कपिल देव से कराया था परिचय
किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में भी सहायक है वर्मी कंपोस्ट
वर्मी कंपोस्ट एवं वर्मीवाश में सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, नाइट्रोजन, खनिज लवण, एंजाइम, हॉर्मोंस तथा विटामिन के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक गुण समुचित मात्रा में पाया जाता है। इसका उत्पादन तथा प्रयोग बहुत ही आसन तथा कम खर्चीला होने के कारण छोटे किसानों के लिए यह एक वरदान सिद्ध हो रहा है। वर्मीकंपोस्ट और वर्मीवाश के साथ जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से पौधों में अच्छी वृद्धि के साथ-साथ कई तरह की बीमारियों से छुटकारा मिलता है। यह कम लागत में अधिक उपज प्रदान कर किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती है।
इसे भी पढ़ें: करीब 80 हजार लोग हैं सांस संबंधी रोगों की चपेट में, डॉक्टरों ने जताई चिंता
वर्मी कम्पोस्टिंग बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का एक अच्छा साधन है, क्योंकि खेतों बागवानी एवं घरों के बेकार कूड़े-कचरे को इकट्ठा करके केंचुए की सहायता से वर्मी कंपोस्ट में बदलकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। तैयार वर्मीकंपोस्ट को 10 से 15 रुपये प्रति किलो की दस से बाजार में जैविक खाद के रूप में बेच कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। वर्मी कंपोस्ट एवं वर्मीवाश के प्रयोग से रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के प्रयोग से बचने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।
इसे भी पढ़ें: सात ज्योतिर्लिंगों का दर्शन कराने कल रवाना होगी भारत गौरव ट्रेन
गोविवि प्राणी विज्ञान विभाग प्रो. केशव सिंह ने कहा कि रासायनिक खाद और वर्मीकंपोस्ट को लेकर खेत व खेती पर पड़ने प्रभाव पर अलग-अलग शोध किया गया। रासायनिक खाद व कीटनाशकों के प्रयोग से खेत व खेती के साथ पर्यावरण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होने के साथ-साथ उपजाऊपन कम होता जा रहा है।