फरुवाही: लोक कलाओं को मिलेगी प्रोत्साहन राशि की संजीवनी, शासन की ओर से पहल शुरू
भाव नृत्य की कलाकार हिना मौर्या कोमल ने बताया कि लोकनृत्य, लोकगीत, लोक वाद्य यह लोक संगीत में एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। लोक नृत्य किसी एक व्यक्ति से निर्मिति नहीं है और न ही एक व्यक्ति की कृपा से जिंदा है। लोक नृत्य की आत्मा और सृजनहार तो समाज है, लोक है।
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लुप्त हो रही फरुवाही, धोबिया नृत्य, संस्कार गीतों आदि कलाओं को संजीवनी मिलने जा रही है। शासन की ओर से ऐसी लोक कलाएं जो लुप्त होने के कगार पर हैं, उन्हें बचाने के लिए पांच लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी, ताकि फिर से वे अपनी खोई हुई पहचान को पा सकें।
पर्यटन नीति 2022 के तहत स्थानीय और लुप्तप्राय कला, संगीत, हस्तकला, लोक नृत्य व व्यंजनों को पुनर्जीवित करने में लगे व्यक्तियों और समूहों को पांच लाख रुपये की वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाने की व्यवस्था शासन की ओर से की गई है। यह प्रोत्साहन राशि जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला पर्यटन व संस्कृति परिषद की संस्तुति पर दी जाएगी। प्रत्येक वित्तीय वर्ष में मंडल के अधिकतम 10 आवेदकों को पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर प्रोत्साहन राशि दिए जाने की व्यवस्था है।
क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी रविंद्र कुमार मिश्र ने कहा कि लुप्त होती कला, संगीत, हस्तकला, लोक नृत्य व व्यंजनों को बचाने के किए प्रयासरत व्यक्ति व संस्था को शासन के निर्देश पर पांच लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दिए जाने की योजना है। आवेदन के बाद पात्रों को यह प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
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क्या है फरुवाही नृत्य
फरुवाही कलाकार रामज्ञान यादव ने बताया कि फरुवाही नृत्य भगवान श्रीकृष्ण द्वारा किया जाता था। इसीलिए इस नृत्य को द्वापर युग में कन्हैया नृत्य कहा जाता था। लगभग पांच हजार वर्षों से भी अधिक पुराने इस लोकनृत्य को विशेष वेशभूषा के चलते जांघिया नृत्य भी कहते हैं। नर्तकों द्वारा अलग अंदाज में उछल-कूद कर नाचने से हो फर्री नृत्य रूप में भी इसे पहचान मिली। वर्तमान में इसे फर नृत्य कहते हैं।
यही लोकनृत्य आज के नौटंकी नृत्य, कहरउवा नृत्य, चमरउवा नृत्य, धोबियउवा नृत्य की उत्पत्ति का स्रोत है। वर्तमान में इसे फरुवाही नृत्य कहते हैं। पंजाब की लोकप्रिय लोकनृत्य भांगड़ा भी इसी नृत्य से प्रभावित है। रोमांचकारी और जोशीले इस लोक नृत्य को देखने मात्र से ही शरीर में रोमांच भर जाता है।
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भाव नृत्य की कलाकार हिना मौर्या कोमल ने बताया कि लोकनृत्य, लोकगीत, लोक वाद्य यह लोक संगीत में एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। लोक नृत्य किसी एक व्यक्ति से निर्मिति नहीं है और न ही एक व्यक्ति की कृपा से जिंदा है। लोक नृत्य की आत्मा और सृजनहार तो समाज है, लोक है। इसके बदले में समाज या लोक का आनंद स्रोत लोकनृत्य है। लोकनृत्य किसी भी समाज, क्षेत्र, अंचल और राष्ट्र की जिंदादिली की परिचायक है।