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Gorakhpur News: हिमाचल की कंपनियों से आती हैं नकली दवाइयां, जांच में मिलती हैं अधोमानक
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एक दवा कंपनी की तरफ से दी जानकारी पर हो रही छानबीन
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। किसी बड़े ब्रांड की दवा से मिलते-जुलते नाम वाली दवाइयां गोरखपुर की मंडी में अधिकतर हिमाचल प्रदेश से आती हैं। सैंपल जांच में ये दवाएं अधोमानक पाई जाती हैं। इसीलिए इन पर कोई सीधी कार्रवाई नहीं होती। जब तक दवा पकड़ी नहीं जाती, वह असली के रेट में ही बिकती रहती हैं। बीते साल ही तमाम दवाएं अधोमानक मिल भी चुकी हैं, लेकिन तकनीकी दांव-पेच लगाकर दुकानदार इसमें साफ बच निकलते हैं।
दवा कारोबार से जुड़े एक शख्स ने बताया कि जैसे पेट दर्द की कोई दवा, जिसकी ब्रांड वैल्यू बहुत अधिक है, तो उसके नाम से मिलती-जुलती दवा हिमाचल प्रदेश में खुली फर्म से बनवा लिया जाता है। जब यह नई दवा बाजार में आती है तो उसके नाम और बड़े ब्रांड वाले के नाम में केवल कुछ स्पेलिंग का ही अंतर होता है। दवा का पत्ता, रंग आदि सब कुछ मिलता-जुलता रहता है, लेकिन उस पर बैच नंबर, उत्पादन व एक्सपायरी डेट आदि अपने हिसाब से दर्ज होता है।
अगर ये दवा कहीं जांच में पकड़ ली गई तो सैंपल टेस्ट के लिए भेजा जाता है। इसके सैंपल में साल्ट मानक से कम पाए जाते हैं। इस पर कंपनी उस बैच की दवा वापस लेने की घोषणा कर देती है और फिर सारा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
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ब्रांडिंग में नहीं होता खर्च, ब्रांड वैल्यू का मिलता है लाभ
ऐसी दवा की बिक्री का सबसे बड़ा आधार ही नामी दवा कंपनी है। चूंकि डॉक्टर दवा का नाम लिखते हैं तो मेडिकल स्टोर वाले भी आराम से मरीज को मिलते-जुलते नाम वाले दवा का पत्ता पकड़ा देते हैं। दवा बनाने वाली कंपनी को न तो अपने ब्रांड की वैल्यू पर खर्च करना पड़ता है और न ही इसके लिए अलग से प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है। अगर दवा पकड़ भी ली गई तो स्पेलिंग अलग होने और साल्ट में कमी पाए जाने के चलते केवल कठोर चेतावनी और उस बैच की दवा को ही बाजार से वापस कराने भर से काम आसानी से चल जाता है।
नशीली दवाओं का ट्रांजिट सेंटर बन गया है गोरखपुर
गोरखपुर। भलोटिया मार्केट नशीली दवाओं का ट्रांजिट स्टेशन बनता जा रहा है। बीते मई में पटना में पकड़ी गई नशीली दवाएं गोरखपुर के नाम पर भेजी गई थीं। नारकोटिक्स ब्यूरो ने गोरखपुर की तीन दुकानों की जांच भी की थी। यह दीगर है कि उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। इससे पहले भी गोरखपुर के पास नशीली दवाइयों की बड़ी खेप मिल चुकी है।
18 मई को तीन दुकानों की हुई जांच
पटना में पकड़ी गई नशीली दवाओं की छानबीन करने गोरखपुर आई सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नार्कोटिक्स (सीबीएन) की टीम ने 18 मई को भालोटिया मार्केट के तीन बड़े थोक विक्रेताओं के फर्मों की जांच की है। टीम की अगुआई सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के सीनियर इंस्पेक्टर अनूप गैरोला और रवि रंजन कर रहे थे। टीम में दो इंस्पेक्टर और 6 सिपाही शामिल भी आए थे। टीम यहां से कई अभिलेख भी ले गई।
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गीडा में पकड़ी गई थीं दो करोड़ की दवाएं
अगस्त 2022 में गीडा से छह लोगों को गिरफ्तार कर उनके पास से दो करोड़ रुपये की प्रतिबंधित दवाओं को बरामद किया था। इस मामले में आरोपियों को बचाने के लिए जांच टीम को दिए गए 15 लाख रुपये भी जब्त किए गए थे। नारकोटिक्स में (एनडीपीएस) शामिल इन दवाओं को गीडा थानाक्षेत्र के तेनुआ टोल प्लाजा के पास बस्ती मंडल के सहायक औषधि आयुक्त नरेश मोहन दीपक और डिप्टी कमिश्नर ड्रग्स गोरखपुर मंडल एजाज अहमद के नेतृत्व में पकड़ा गया था।
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महराजगंज में भी हुई थी बरामदगी
जमुई कला गांव में तीन अगस्त 2021 को 686 करोड़ की नशीली दवाओं और उनकी इंटरनेशनल तस्करी के मामले में कार्रवाई हुई थी। मुख्य सरगना को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। प्रतिबंधित नशीली दवाएं, इंजेक्शन, सीरप, टैबलेट अच्छे दामों पर बिकने वाली दवाओं और इंजेक्शन के रैपर को बदलकर नया और अधिक दाम का रैपर लगाकर अपने घर व गोदाम से बेचता था।
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युवाओं पर पड़ रहा गहरा असर
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. तापस कुमार आईच बताते हैं कि नशीली दवाएं मनुष्य के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। उनके काम करने की क्षमता, सोचने समझने की क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता में गिरावट आती है। व्यक्ति सामाजिक से आत्म केंद्रित होता जाता है। उसके व्यवहार में उग्रता आती है और अंत में वह खुद की परवाह भी नहीं करता। दवाएं शरीर की मांसपेशियों पर भी नकारात्मक असर डालती हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। किसी बड़े ब्रांड की दवा से मिलते-जुलते नाम वाली दवाइयां गोरखपुर की मंडी में अधिकतर हिमाचल प्रदेश से आती हैं। सैंपल जांच में ये दवाएं अधोमानक पाई जाती हैं। इसीलिए इन पर कोई सीधी कार्रवाई नहीं होती। जब तक दवा पकड़ी नहीं जाती, वह असली के रेट में ही बिकती रहती हैं। बीते साल ही तमाम दवाएं अधोमानक मिल भी चुकी हैं, लेकिन तकनीकी दांव-पेच लगाकर दुकानदार इसमें साफ बच निकलते हैं।
दवा कारोबार से जुड़े एक शख्स ने बताया कि जैसे पेट दर्द की कोई दवा, जिसकी ब्रांड वैल्यू बहुत अधिक है, तो उसके नाम से मिलती-जुलती दवा हिमाचल प्रदेश में खुली फर्म से बनवा लिया जाता है। जब यह नई दवा बाजार में आती है तो उसके नाम और बड़े ब्रांड वाले के नाम में केवल कुछ स्पेलिंग का ही अंतर होता है। दवा का पत्ता, रंग आदि सब कुछ मिलता-जुलता रहता है, लेकिन उस पर बैच नंबर, उत्पादन व एक्सपायरी डेट आदि अपने हिसाब से दर्ज होता है।
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अगर ये दवा कहीं जांच में पकड़ ली गई तो सैंपल टेस्ट के लिए भेजा जाता है। इसके सैंपल में साल्ट मानक से कम पाए जाते हैं। इस पर कंपनी उस बैच की दवा वापस लेने की घोषणा कर देती है और फिर सारा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
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ब्रांडिंग में नहीं होता खर्च, ब्रांड वैल्यू का मिलता है लाभ
ऐसी दवा की बिक्री का सबसे बड़ा आधार ही नामी दवा कंपनी है। चूंकि डॉक्टर दवा का नाम लिखते हैं तो मेडिकल स्टोर वाले भी आराम से मरीज को मिलते-जुलते नाम वाले दवा का पत्ता पकड़ा देते हैं। दवा बनाने वाली कंपनी को न तो अपने ब्रांड की वैल्यू पर खर्च करना पड़ता है और न ही इसके लिए अलग से प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है। अगर दवा पकड़ भी ली गई तो स्पेलिंग अलग होने और साल्ट में कमी पाए जाने के चलते केवल कठोर चेतावनी और उस बैच की दवा को ही बाजार से वापस कराने भर से काम आसानी से चल जाता है।
नशीली दवाओं का ट्रांजिट सेंटर बन गया है गोरखपुर
गोरखपुर। भलोटिया मार्केट नशीली दवाओं का ट्रांजिट स्टेशन बनता जा रहा है। बीते मई में पटना में पकड़ी गई नशीली दवाएं गोरखपुर के नाम पर भेजी गई थीं। नारकोटिक्स ब्यूरो ने गोरखपुर की तीन दुकानों की जांच भी की थी। यह दीगर है कि उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। इससे पहले भी गोरखपुर के पास नशीली दवाइयों की बड़ी खेप मिल चुकी है।
18 मई को तीन दुकानों की हुई जांच
पटना में पकड़ी गई नशीली दवाओं की छानबीन करने गोरखपुर आई सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नार्कोटिक्स (सीबीएन) की टीम ने 18 मई को भालोटिया मार्केट के तीन बड़े थोक विक्रेताओं के फर्मों की जांच की है। टीम की अगुआई सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के सीनियर इंस्पेक्टर अनूप गैरोला और रवि रंजन कर रहे थे। टीम में दो इंस्पेक्टर और 6 सिपाही शामिल भी आए थे। टीम यहां से कई अभिलेख भी ले गई।
गीडा में पकड़ी गई थीं दो करोड़ की दवाएं
अगस्त 2022 में गीडा से छह लोगों को गिरफ्तार कर उनके पास से दो करोड़ रुपये की प्रतिबंधित दवाओं को बरामद किया था। इस मामले में आरोपियों को बचाने के लिए जांच टीम को दिए गए 15 लाख रुपये भी जब्त किए गए थे। नारकोटिक्स में (एनडीपीएस) शामिल इन दवाओं को गीडा थानाक्षेत्र के तेनुआ टोल प्लाजा के पास बस्ती मंडल के सहायक औषधि आयुक्त नरेश मोहन दीपक और डिप्टी कमिश्नर ड्रग्स गोरखपुर मंडल एजाज अहमद के नेतृत्व में पकड़ा गया था।
महराजगंज में भी हुई थी बरामदगी
जमुई कला गांव में तीन अगस्त 2021 को 686 करोड़ की नशीली दवाओं और उनकी इंटरनेशनल तस्करी के मामले में कार्रवाई हुई थी। मुख्य सरगना को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। प्रतिबंधित नशीली दवाएं, इंजेक्शन, सीरप, टैबलेट अच्छे दामों पर बिकने वाली दवाओं और इंजेक्शन के रैपर को बदलकर नया और अधिक दाम का रैपर लगाकर अपने घर व गोदाम से बेचता था।
युवाओं पर पड़ रहा गहरा असर
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. तापस कुमार आईच बताते हैं कि नशीली दवाएं मनुष्य के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। उनके काम करने की क्षमता, सोचने समझने की क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता में गिरावट आती है। व्यक्ति सामाजिक से आत्म केंद्रित होता जाता है। उसके व्यवहार में उग्रता आती है और अंत में वह खुद की परवाह भी नहीं करता। दवाएं शरीर की मांसपेशियों पर भी नकारात्मक असर डालती हैं।