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Gorakhpur New: रामगढ़ताल में अचानक कैसे मरी मछलियां? पानी के क्लालिटी की होगी जांच- दोषियों पर होगा 'एक्शन'
Sun, 30 Jun 2024 06:02 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 30 Jun 2024 06:02 PM IST
सार
रामगढ़ताल में मरीं मछलियां निकाल ली गई हैं। शनिवार को ताल की सफाई भी कराई गई। जीडीए उपाध्यक्ष आनंद वर्द्धन एवं सचिव यूपी सिंह ने भी रामगढ़ताल का निरीक्षण किया। उन्होंने ताल के पानी की गुणवत्ता की जांच के निर्देश दिए हैं। ताल में गंदगी फैलाने वाले दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भी निर्देश दिया है।
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यूपीपीसीबी कर्मचारियों द्वारा रामगढ़ ताल से पानी के नमूने एकत्र किया गया
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
गोरखपुर के रामगढ़ताल में मरीं मछलियां निकाल ली गई हैं। शनिवार को ताल की सफाई भी कराई गई। जीडीए उपाध्यक्ष आनंद वर्द्धन एवं सचिव यूपी सिंह ने भी रामगढ़ताल का निरीक्षण किया। उन्होंने ताल के पानी की गुणवत्ता की जांच के निर्देश दिए हैं।
इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों ने ताल से नमूने भी एकत्र किए। जीडीए के मुख्य अभियंता किशन सिंह ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी कार्यालय को पत्र भेजकर तीन दिन में रिपोर्ट मांगी है।
शुक्रवार को रामगढ़ताल के किनारे बड़ी संख्या में रोहू, भाकुर व अन्य प्रजाति की पाली गईं मछलियां मरी मिलीं। ताल में मछली पालन का व्यवसाय करने वाले मत्स्यजीवी सहकारी समिति के पदाधिकारियों ने ताल का पानी कम होने और तल गरम होने से मछलियां मरने की बात कही।
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वहीं, पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ताल के पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम होने पर जलीव जीव मरने लगते हैं। रामगढ़ताल में भी ऐसा ही हुआ होगा।
मछली पालकों ने 40 से 50 लाख रुपये के नुकसान की आशंका जताई है। वहीं ताल के पानी से उठ रही बदबू के चलते किनारे टहलने वाले भी परेशान दिखे। मामला सामने आने के बाद जल निगम ने कुछ ही देर बाद ताल के पानी को शुद्ध होने का दावा भी कर दिया। मछलियाें के मरने से बिगड़ रही स्थिति को देखते हुए मछली पालकों ने पांच नाव लगाकर मछलियों को हटवाना शुरू किया।
शुक्रवार व शनिवार को ताल की सफाई भी कराई गई। शनिवार की सुबह तक मरीं मछलियों को निकाल लिया गया था, जिससे ताल से बदबू आनी बंद हो गई। दोपहर में जीडीए उपाध्यक्ष व सचिव ने ताल का निरीक्षण कर पानी की गुणवत्ता जांचने के निर्देश दिए।
नया सवेरा से चिड़ियाघर तक लिया गया सैंपल
जीडीए की तरफ से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र भेजकर नया सवेरा से लेकर चिड़ियाघर की ओर जाने वाली सड़क से लगे ताल के पानी का सैंपल लेने के लिए कहा गया है। तीन दिन में जांच रिपोर्ट और विभागीय राय भी मांगी गई है।
उधर, शनिवार दोपहर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों ने ताल से नमूने भी एकत्र किए। प्राधिकरण के मुख्य अभियंता किशन सिंह का दावा है कि तीन दिन में रिपोर्ट आ जाएगी। हालांकि मछलियों के पोस्टमार्टम कराने की पहल न तो मछली पालन का ठेका लेने वाली मत्स्यजीवी सहकारी समिति ने की और न जीडीए ने ही इस पर ध्यान दिया।
मत्स्यजीवी सहकारी समिति के अध्यक्ष मदन लाल व सचिव बलदेव सिंह ने कहा कि अधिकांश मृत मछलियों को ताल से निकाला जा चुका है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय से भी ली जा सकती है मदद
जीडीए रामगढ़ताल में मछलियों के मरने के कारणों की जांच के लिए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से भी मदद ले सकता है। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से ताल के पानी की गुणवत्ता को लेकर कई बार अध्ययन किया जा चुका है।
एक बार भारी मात्रा में मछलियां मृत पाई गई थीं, जिसके बाद विभाग ने अध्ययन कराया था। इसमें ताल के पानी में ऑक्सीजन की कमी मिली थी। चर्चा है कि इस बार भी प्राधिकरण की ओर से विश्वविद्यालय को पत्र लिखा जा सकता है।
क्रूज, बोट संचालकों को दी गई चेतावनी
निरीक्षण के लिए पहुंचे जीडीए उपाध्यक्ष ने क्रूज और बोट संचालकों को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित कराएं कि यात्रा करने वाले लोगों के हाथ में पानी की बोतल, रैपर आदि न हो। यदि ताल के पानी में बोतल या रैपर फेंककर गंदगी की गई तो संचालकों के विरुद्ध कार्रवाई होगी।
एक्सपर्ट कमेंट के तौर पर राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, गोंडा के कार्यकारी निदेशक प्रो गोविंद पांडेय ने बताया कि रामगढ़ताल में जिस तरह से सिर्फ बड़ी मछलियां मरी हैं, यह ऑक्सीजन की कमी की ओर इशारा कर रही है। इस तापमान में रामगढ़ताल में एल्गल ब्लूम हो जाता है।
इससे शैवालों की संख्या बढ़ जाती है और पानी हरा नजर आने लगता है। इस स्थिति में घुलित ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ जाती है। इससे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिसका असर उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं पर होता है।
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इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों ने ताल से नमूने भी एकत्र किए। जीडीए के मुख्य अभियंता किशन सिंह ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी कार्यालय को पत्र भेजकर तीन दिन में रिपोर्ट मांगी है।
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शुक्रवार को रामगढ़ताल के किनारे बड़ी संख्या में रोहू, भाकुर व अन्य प्रजाति की पाली गईं मछलियां मरी मिलीं। ताल में मछली पालन का व्यवसाय करने वाले मत्स्यजीवी सहकारी समिति के पदाधिकारियों ने ताल का पानी कम होने और तल गरम होने से मछलियां मरने की बात कही।
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वहीं, पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ताल के पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम होने पर जलीव जीव मरने लगते हैं। रामगढ़ताल में भी ऐसा ही हुआ होगा।
मछली पालकों ने 40 से 50 लाख रुपये के नुकसान की आशंका जताई है। वहीं ताल के पानी से उठ रही बदबू के चलते किनारे टहलने वाले भी परेशान दिखे। मामला सामने आने के बाद जल निगम ने कुछ ही देर बाद ताल के पानी को शुद्ध होने का दावा भी कर दिया। मछलियाें के मरने से बिगड़ रही स्थिति को देखते हुए मछली पालकों ने पांच नाव लगाकर मछलियों को हटवाना शुरू किया।
शुक्रवार व शनिवार को ताल की सफाई भी कराई गई। शनिवार की सुबह तक मरीं मछलियों को निकाल लिया गया था, जिससे ताल से बदबू आनी बंद हो गई। दोपहर में जीडीए उपाध्यक्ष व सचिव ने ताल का निरीक्षण कर पानी की गुणवत्ता जांचने के निर्देश दिए।
नया सवेरा से चिड़ियाघर तक लिया गया सैंपल
जीडीए की तरफ से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र भेजकर नया सवेरा से लेकर चिड़ियाघर की ओर जाने वाली सड़क से लगे ताल के पानी का सैंपल लेने के लिए कहा गया है। तीन दिन में जांच रिपोर्ट और विभागीय राय भी मांगी गई है।
उधर, शनिवार दोपहर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कर्मचारियों ने ताल से नमूने भी एकत्र किए। प्राधिकरण के मुख्य अभियंता किशन सिंह का दावा है कि तीन दिन में रिपोर्ट आ जाएगी। हालांकि मछलियों के पोस्टमार्टम कराने की पहल न तो मछली पालन का ठेका लेने वाली मत्स्यजीवी सहकारी समिति ने की और न जीडीए ने ही इस पर ध्यान दिया।
मत्स्यजीवी सहकारी समिति के अध्यक्ष मदन लाल व सचिव बलदेव सिंह ने कहा कि अधिकांश मृत मछलियों को ताल से निकाला जा चुका है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय से भी ली जा सकती है मदद
जीडीए रामगढ़ताल में मछलियों के मरने के कारणों की जांच के लिए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से भी मदद ले सकता है। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से ताल के पानी की गुणवत्ता को लेकर कई बार अध्ययन किया जा चुका है।
एक बार भारी मात्रा में मछलियां मृत पाई गई थीं, जिसके बाद विभाग ने अध्ययन कराया था। इसमें ताल के पानी में ऑक्सीजन की कमी मिली थी। चर्चा है कि इस बार भी प्राधिकरण की ओर से विश्वविद्यालय को पत्र लिखा जा सकता है।
क्रूज, बोट संचालकों को दी गई चेतावनी
निरीक्षण के लिए पहुंचे जीडीए उपाध्यक्ष ने क्रूज और बोट संचालकों को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित कराएं कि यात्रा करने वाले लोगों के हाथ में पानी की बोतल, रैपर आदि न हो। यदि ताल के पानी में बोतल या रैपर फेंककर गंदगी की गई तो संचालकों के विरुद्ध कार्रवाई होगी।
एक्सपर्ट कमेंट के तौर पर राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, गोंडा के कार्यकारी निदेशक प्रो गोविंद पांडेय ने बताया कि रामगढ़ताल में जिस तरह से सिर्फ बड़ी मछलियां मरी हैं, यह ऑक्सीजन की कमी की ओर इशारा कर रही है। इस तापमान में रामगढ़ताल में एल्गल ब्लूम हो जाता है।
इससे शैवालों की संख्या बढ़ जाती है और पानी हरा नजर आने लगता है। इस स्थिति में घुलित ऑक्सीजन की खपत भी बढ़ जाती है। इससे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिसका असर उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं पर होता है।