गोरखपुर विश्वविद्यालय: पड़ोसी देशों के शैक्षणिक संस्थानों से अनुबंध करेगा डीडीयू, इनसे गहरा होगा संबंध
गोविवि कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि पड़ोसी देशों से शैक्षणिक संबंध बनाने के लिए उनके शैक्षणिक संस्थानों से एमओयू पर हस्ताक्षर किया जाएगा। इसके लिए 12 शैक्षणिक संस्थानों से संपर्क स्थापित किया गया है। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, काठमांडू ने इसके लिए सहमति दे दी है। जल्द ही उनके साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया जाएगा।
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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को अपने यहां पढ़ाई के लिए आकर्षित करने के लिए उनके शैक्षणिक संस्थानों से अनुबंध करेगा। पड़ोसी देश नेपाल, भूटान, मालदीव और श्रीलंका से शैक्षणिक संबंध स्थापित करने की पहल शुरू कर दी गई है। इसी कड़ी में नेपाल राष्ट्र के त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, काठमांडू से जल्द अनुबंध (एमओयू) पर हस्ताक्षर हो जाएगा।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में हमेशा से पड़ोसी देश नेपाल से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते रहे हैं। इसको और बढ़ावा देने के उद्देश्य से नेपाल समेत अन्य पड़ोसी देशों से शैक्षणिक संबंध स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। दीक्षांत समारोह में भी नेपाल के तीन शोधार्थियों को उपाधि दी गई।
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राज्यपाल ने भी अपने संबोधन में पड़ोसी देशों से शैक्षणिक संबंध स्थापित करने की सलाह दी थी। उनकी सलाह पर अमल करते हुए नेपाल समेत पड़ोसी राष्ट्र के 12 शैक्षणिक संस्थानों से संपर्क स्थापित किया गया है। इसकी पहली कड़ी में संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही गोरखपुर विश्वविद्यालय त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर करने वाला है। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी ने इसके लिए सहमति भी जताई है।
एमओयू के अंतर्गत जॉइंट डिग्री और स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम को शुरू करने पर सहमति बनेगी। कुलपति के निर्देश पर गोविवि के अंतर्राष्ट्रीय सेल की दो प्राथमिकताएं निर्धारित की गई हैं। कोशिश है कि पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, भूटान, श्रीलंकाई और मालदीव के साथ एक मजबूत सहयोग, छात्र एवं संकाय के आदान-प्रदान बनाने पर हो सके।
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गिरमिटिया देशों से भी शैक्षणिक संबंध बढ़ाने का प्रयास
गोरखपुर विश्वविद्यालय का अंतरराष्ट्रीय सेल भारतवंशियों विशेष रूप से गिरमिटिया देशों फिजी, सूरीनाम, गुयाना, मॉरीशस, त्रिनिदाद-और टोबैगो के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इन देशों के शिक्षण संस्थानों से एमओयू के लिए बातचीत की जा रही है। इन देशों में बड़ी संख्या में भारतवंशी अंग्रेजी शासन के दौरान गिरमिटिया मजदूर के रूप में गए थे, वे आज काफी प्रभावशाली हैं। वे भारत से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं भावनात्मक रूप से लगाव रखते हैं और भारत के शिक्षण संस्थानों से जुड़ना चाहते हैं।
रैंकिंग में विकासशील देशों की महत्वपूर्ण भूमिका
विश्वविद्यालय रैंकिंग जैसे एनआईआरएफ और क्यूएस रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन के लिए धारणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। क्यूएस रैंकिंग में करीब 50-60 प्रतिशत मूल्यांकन धारणा पर निर्भर करता है। इसमें विकासशील देशों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसलिए इंटरनेशनल सेल विकासशील देशों के छात्रों/संकायों को आकर्षित करने के लिए एक विंडो खोलने के लिए अग्रसर है।
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इसके साथ ही गोरखपुर विश्वविद्यालय विदेश मंत्रालय की ओर से शुरू ''नो इंडिया प्रोग्राम'' (भारत को जानिए) कार्यक्रम (केआईपी) में भाग लेगा। इसमें प्रवासी भारतीय छात्र गौरवशाली भारतीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में जानने के लिए भारत आते हैं।
गोविवि कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि पड़ोसी देशों से शैक्षणिक संबंध बनाने के लिए उनके शैक्षणिक संस्थानों से एमओयू पर हस्ताक्षर किया जाएगा। इसके लिए 12 शैक्षणिक संस्थानों से संपर्क स्थापित किया गया है। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, काठमांडू ने इसके लिए सहमति दे दी है। जल्द ही उनके साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया जाएगा। इसके अलावा गिरमिटिया देशों से भी शैक्षणिक संबंध बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।