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उड़ती चिड़िया के पंख गिन लेते हैं ये 5 छात्र, जानिए कैसे

Sun, 31 May 2020 11:22 AM IST
vivek shukla विवेक सिंह, गोरखपुर।
विवेक सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 31 May 2020 11:22 AM IST
सार

  • जुलोजी विभाग के पांच युवाओं की टीम ने हासिल की उपलब्धि
  • कैंपस में 45 प्रजातियों के पक्षियों को किया चिन्हित

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DDU five students do unique project on birds at gorakhpur
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के रिचा सिंह, अवंतिका जायसवाल, जान्हवी सिंह, निधि सिंह और शैलेंद्र कुमार भास्कर। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

मुहावरा है उड़ती चिड़िया के पंख गिनना। कभी सोचा है कि अगर वास्तव में ऐसा करना हो तो कितनी मशक्कत झेलनी पड़ेगी। गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पांच विद्यार्थियों ने न केवल उनके पंख बल्कि उनके पूरे हाव भाव मसलन आंखों का रंग, लड़ने के तरीके, अंग, आकार, चोंच और उनकी आवाज को सुनकर यूनिवर्सिटी कैंपस में आने वाले 45 पक्षियों को चिन्हित करने में सफलता हासिल की है।  

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जुलोजी विभाग के एमएससी (पर्यावरण विज्ञान) द्वितीय वर्ष की रिचा सिंह, अवंतिका जायसवाल, जान्हवी सिंह, निधि सिंह और शैलेंद्र कुमार भास्कर को पक्षियों की विविधता पर यूं तो प्रोजेक्ट के तौर पर ये काम मिला था। वहीं जोश और उत्साह से लबरेज इन युवाओं ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए पांच महीनों के अथक प्रयास के बाद यह उपलब्धि हासिल की है।
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उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर (सितंबर 2017 - फरवरी 2018) के बीच काम किया। इसके तहत कैंपस में हरियाली की प्रचुर मात्रा और भोजन की उपलब्धता को लेकर कैंपस में कुछ स्थानों को चिन्हित किया। इनमें बॉटनिकल गार्डेन, कला संकाय, विधि विभाग, बीएससी गृह विज्ञान समेत विधि विभाग के पास पक्षियों की अच्छी तादात नजर आई।

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पक्षियों की कुछ महत्वपूर्ण देसी प्रजातियां

इसके बाद योजना को जमीन पर उतारने की कोशिश शुरू हुई। इसके मुताबिक टीम के हर सदस्य की एक अहम भूमिका मौजूद थी। कोई चारा डालकर पक्षियों को जमीन पर आने को मजबूर करता था। कुछ सदस्य पक्षियों को दूरबीन की सहायता से देखते थे।

एक सदस्य पक्षियों की पहचान के लिए बने नियमों के मुताबिक आंखों, लड़ने के तरीके, अंग, आकार पर दूरबीन से देखने वाले सदस्य से जानकारी मांगता था। एक सदस्य रजिस्टर पर मिली पहचान के आगे सही और गलत का निशान लगाता था। हर दिन हर सदस्य की भूमिका में बदलाव होता था, ताकि दूसरों को भी बराबर मौका मिले।
 
कोतवाल, मूटरी, सेवन सिस्टर्स, कबूतर, खंजन, मैना, बुलबुल, पीलक, नील कंठ, फाक्टा, कठफोड़वा, कोयल, टिटिहरी, हुदहुद, धानेश, शिकरा, पपीहा समेत पूर्वांचल में पाई जाने वाली 45 प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं।

रूस की गुलाबी मैना भी यूनिवर्सिटी कैंपस में टिकी

गुलाबी मैना या गुलाबी सारिका स्टर्निडी परिवार का एक पक्षी है। इसमें मैना भी शामिल है। इनके अन्य नाम तिल्यर या तेलियर और कन्नड़ भाषा में इसके मधुर गीत के कारण इसे मधुसारिका भी कहते हैं। यह एक प्रवासी पक्षी है, जो अपने प्रवास के दौरान छह से आठ माह तक भारत में रहते हैं। ये पक्षी मुख्यत: मैदानी क्षेत्रों में रहते हैं। ये कजाकिस्तान समेत रूस में पाए जाते हैं।
 
महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी भी बना मेहमान
यूनिवर्सिटी कैंपस में मिले पक्षियों की जमात में महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी हरियल भी शामिल हैं। इसे पीले पैरों वाले हरे कबूतर के नाम से भी जाना जाता है। यह ट्रेरन फॉनीकॉप्टेरा की प्रजाति का है।
 
हर दिन किया छह घंटों तक काम
युवाओं ने बताया कि स्थान का चयन किए जाने के बाद एक समय सारिणी बनाई गई। दिन में उनकी ज्यादा हलचल ज्यादातर सुबह भोजन की तलाश और शाम को घर वापसी के दौरान होती है। इसे ध्यान में रखकर तीन-तीन घंटे सुबह 7-10 बजे और दोपहर से 2-5बजे की समय सारिणी बनाई गई। छह घंटो के बाद कभी पक्षी को पहचानने में सफलता मिल जाती थी, नहीं तो कई दिन निराश होकर भी घर लौटना पड़ता था।

गोरखपुर में मौजूद हैं 345 प्रजातियों के परिंदे

युवाओं ने बताया कि 2013 की एवीआई बर्ड काउंट रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर इलाके के 5484 किलोमीटर के भूभाग में करीब 345 प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं। इसमें अकेले 1.214 किलोमीटर भूभाग में फैले यूनिवर्सिटी में 12.5 प्रतिशत पक्षी मौजूद हैं। इनमें लोकल पक्षियों के साथ ही मेहमान परिंदे भी शामिल हैं।  
 
इनका मिला मार्गदर्शन
प्रोजेक्ट को पूरा करने में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के जुलोजी विभाग के शिक्षक प्रो. डीके सिंह, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. विनीत कुमार समेत कंचनजंगा वन्य अभ्यारण्य के पूर्व प्रधान वार्डेन प्रतीक चंदन को पूरा मार्गदर्शन मिला। समय समय इन अनुभवी शिक्षकों की टीम ने उन्हें प्रोत्साहित किया।

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