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Gorakhpur News: गए वक्त को हम बुलाने गए थे, हथेली पर सरसों उगाने गए थे...
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गोरखपुर। प्रत्येक पूर्णिमा को पूर्णमासीय काव्य संध्या गोष्ठी करने वाली साहित्यिक, सामाजिक एवं सास्कृतिक संस्था सलिल की तरफ से बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें उपस्थित कवियों ने रचनाएं प्रस्तुत कर लोगों की खूब वाह वाही लूटी। विनय कुमार अजीज की रचना गए वक्त को हम बुलाने गए थे, हथेली पर सरसों उगाने गए थे... को खूब सराहा गया।
सलिल की तरफ से आयोजित 212 वीं शृंखला की अध्यक्षता जयप्रकाश नायक ने की। जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में अरविंद कुमार यादव मौजूद थे। गोष्ठी का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। कार्यक्रम का संचालन नीलकमल गुप्त विक्षिप्त ने किया। कवियों ने कविताओं से समाज और लोगों पर कटाक्ष किया। श्रीयांश शर्मा ने एसी में रहने और बिसलरी का पानी पीने वालों पर कटाक्ष करते हुए कविता सुनाई। कहा- एसी की हवा बिसलरी का पानी, उठा सका न पचास किलो बोझ, हाय जवानी...।
वहीं निर्मल कुमार निर्मल ने कुछ इस तरह कविता सुनाई- मेरे करीब सतगुरु रूपी आत्मा है, मगर उस पर टिकता विश्वास नहीं है। मैं एक जलता हुआ दीपक हूं, मगर उसमें तनिक भी प्रकाश नहीं है।
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अभय प्रकाश श्रीवास्तव ने कुछ इस तरह से कविता सुनाई- हे माता मेरा भ्रम मिटाओ, अपनी जातपात समझाओ... जग को जननी कहते जनजन रंग रूप रस स्वाद बताओ...।
सरदार राम सिंह की कविता कुछ तरह से रही- मेरे प्यार को ठुकराया जिसने, वो भी चैन न पाया होगा। मुझको रोता छोड़ गया जो, वह भी अश्क बहाया होगा।
नंदकुमार त्रिपाठी ने कुछ इस तरह से कहा- बंद करो यह कहना, चरखे से आजादी आई है, लाखों वीरों ने बली दी है, तब हमने आजादी पाई है।
इस तरह से अन्य कई कवियों ने रचनाएं पढ़ीं। संस्था के अध्यक्ष ने कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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सलिल की तरफ से आयोजित 212 वीं शृंखला की अध्यक्षता जयप्रकाश नायक ने की। जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में अरविंद कुमार यादव मौजूद थे। गोष्ठी का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। कार्यक्रम का संचालन नीलकमल गुप्त विक्षिप्त ने किया। कवियों ने कविताओं से समाज और लोगों पर कटाक्ष किया। श्रीयांश शर्मा ने एसी में रहने और बिसलरी का पानी पीने वालों पर कटाक्ष करते हुए कविता सुनाई। कहा- एसी की हवा बिसलरी का पानी, उठा सका न पचास किलो बोझ, हाय जवानी...।
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वहीं निर्मल कुमार निर्मल ने कुछ इस तरह कविता सुनाई- मेरे करीब सतगुरु रूपी आत्मा है, मगर उस पर टिकता विश्वास नहीं है। मैं एक जलता हुआ दीपक हूं, मगर उसमें तनिक भी प्रकाश नहीं है।
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अभय प्रकाश श्रीवास्तव ने कुछ इस तरह से कविता सुनाई- हे माता मेरा भ्रम मिटाओ, अपनी जातपात समझाओ... जग को जननी कहते जनजन रंग रूप रस स्वाद बताओ...।
सरदार राम सिंह की कविता कुछ तरह से रही- मेरे प्यार को ठुकराया जिसने, वो भी चैन न पाया होगा। मुझको रोता छोड़ गया जो, वह भी अश्क बहाया होगा।
नंदकुमार त्रिपाठी ने कुछ इस तरह से कहा- बंद करो यह कहना, चरखे से आजादी आई है, लाखों वीरों ने बली दी है, तब हमने आजादी पाई है।
इस तरह से अन्य कई कवियों ने रचनाएं पढ़ीं। संस्था के अध्यक्ष ने कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया।