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रेलवे में भ्रष्टाचार: रेलवे में अब चर्चा-ए-आम, बिना कमीशन यहां नहीं होता कोई काम

Sat, 16 Sep 2023 12:00 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 16 Sep 2023 12:00 PM IST
सार

विभागीय जानकारों का कहना है कि इस वक्त सबसे अधिक तनाव हर डिपार्टमेंट में पिछले एक साल के दौरान मंगाए गए सामानों को लेकर है। रजिस्टर से लेकर स्टोर तक को अपडेट किया जा रहा है, जिससे कि कहीं आवश्यकता से अधिक डिमांड की कहानी बाहर न आ जाए, वरना जिनका सीधा संबंध नहीं है, वे भी लपेटे में आ जाएंगे।

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Corruption in Railways no work gets done here without commission
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Social media

विस्तार

रेलवे में स्टेपलर की पिन से लेकर रेल की चादर तक खरीदने का अधिकार केवल प्रमुख मुख्य सामग्री प्रबंधक कार्यालय को है। हालांकि, इस केंद्रीयकृत व्यवस्था में कमीशन का खेल हर स्तर पर फैला है। सीबीआई की एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की कार्रवाई के बाद अंदर का खेल छनकर बाहर आ रहा है।

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जो फर्में विभिन्न दफ्तरों में सामान की आपूर्ति देती हैं, उन्हें टेंडर से लेकर भुगतान तक हर कदम पर एडवांस कमीशन देना पड़ता है। अब तक पांच फर्में इस मामले में अलग-अलग जगहों पर अपनी शिकायतें दर्ज करा चुकी हैं, लेकिन मामला बड़े स्तर के अफसरों से जुड़े होने के कारण इस पर सबने चुप्पी साध रखी है।
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बीते मंगलवार को एसीबी ने पूर्वोत्तर रेलवे के प्रमुख मुख्य सामग्री प्रबंधक केसी जोशी को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। शिकायतकर्ता प्रणव त्रिपाठी की गाड़ियां रेलवे में ठेके पर चलती हैं, जिसके कमीशन का भुगतान एडवांस में नहीं करने के चलते ही बात सीबीआई तक पहुंची थी। मामला खुलने के बाद छानबीन शुरू हुई तो यह बात चर्चा में आई कि अब तक पांच अन्य फर्मों ने भी अलग-अलग अफसरों से ऐसे ही टेंडर के बदले एडवांस कमीशन लेने के मामले की शिकायत कर रखी है।

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हालांकि अभी उनकी शिकायतों पर जांच और कार्रवाई नहीं हुई है। रेलवे में ठेकेदारी करने वालों ने बताया कि पहले जिस विभाग में जिस वस्तु की सप्लाई करनी होती है, उसके लिए संबंधित विभाग के अफसर की सेवा करनी पड़ती है। यहां एडवांस देने पर सामग्री की डिमांड तैयार होती है। इसके बाद जैम पोर्टल के जरिए टेंडर होता है।

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टेंडर के लिए सेलेक्ट संस्थाओं के बीच रस्साकशी का फायदा भी अफसरों को ही मिलता है और मामला सेट होने पर यहां भी एडवांस लेकर टेंडर जारी होता है। इसके बाद माल आपूर्ति होती है, जिसका बिल जमा करने और भुगतान होने पर भी सुविधा शुल्क देना होता है। इसके अलावा भागदौड़, चाय-नाश्ता, गेटमैन को सुविधा शुल्क आदि का भुगतान तो सामान्य चलन में है।

विजलेंस जांच से बिगड़ी थी बात

रेल कर्मियों में चर्चा है कि इस मामले की जड़ें विजलेंस जांच से जुड़ी हैं। दरअसल विजलेंस जांच में फंसे एक अफसर की फाइल में एक रिपोर्ट लगनी थी, जिसके बदले पांच लाख रुपये की डिमांड हुई। रुपये नहीं मिले तो रिपोर्ट भी नहीं लगी। यह बात अन्य अफसरों को भी खटकी और लेन देन के मामले बाहर आने लगे। वहीं यह भी चर्चा है कि हर डिपार्टमेंट से महीने की बंधी-बंधाई रकम को लेकर भी तनातनी चल रही थी। एक वरिष्ठ अफसर इस मामले से खुद को अलग रखे हुए थे।

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अपने-अपने रिकाॅर्ड दुरूस्त कर रहे सभी डिपार्टमेंट
विभागीय जानकारों का कहना है कि इस वक्त सबसे अधिक तनाव हर डिपार्टमेंट में पिछले एक साल के दौरान मंगाए गए सामानों को लेकर है। रजिस्टर से लेकर स्टोर तक को अपडेट किया जा रहा है, जिससे कि कहीं आवश्यकता से अधिक डिमांड की कहानी बाहर न आ जाए, वरना जिनका सीधा संबंध नहीं है, वे भी लपेटे में आ जाएंगे।

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