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गुरु पूर्णिमा: गोरक्ष पीठाधीश्वर सीएम योगी भक्तों को देंगे आशीर्वाद, तिलक लगाकर किया जाएगा स्वागत

Thu, 22 Jul 2021 08:59 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 22 Jul 2021 08:59 PM IST
सार

गुरु पूर्णिमा के कार्यक्रम के लिए मंदिर प्रबंधन ने साधु, संत, पुजारी, के अलावा मंदिर से जुड़े प्रमुख लोगों व जनप्रतिनिधियों को आमंत्रण भेजा जा रहा है। इस अवसर पर लोक गायक राकेश श्रीवास्तव भजन व गीत प्रस्तुत करेंगे।

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cm yogi will give blessings to followers on guru purnima in Gorakhpur
सीएम योगी अदित्यनाथ। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गुरु पूर्णिमा का पर्व गोरखनाथ मंदिर में परंपरागत रूप से मनाया जाएगा। इस उत्सव में करोना प्रोटोकाल का पालन किया जाएगा। स्मृति सभागार में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में जो भी भक्त वहां आएंगे, वह गोरक्ष पीठाधीश्वर को तिलक नही लगाएंगे। न ही पीठाधीश्वर भक्तों को तिलक लगाएंगे। यह सब करोना को देखते हुए किया जाएगा। दूर से ही पीठाधीश्वर भक्तों को आशीर्वाद देंगे। इस कार्यक्रम का आनलाइन प्रसारण किया जाएगा।

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शनिवार को होने वाले गुरु पूर्णिमा के कार्यक्रम के लिए मंदिर प्रबंधन ने साधु, संत, पुजारी, के अलावा मंदिर से जुड़े प्रमुख लोगों व जनप्रतिनिधियों को आमंत्रण भेजा जा रहा है। इस अवसर पर लोक गायक राकेश श्रीवास्तव भजन व गीत प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम के समापन के बाद भक्त गण प्रसाद ग्रहण करेंगे।
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मंदिर के सचिव द्वारिका तिवारी ने बताया कि मंदिर में गुरु पूजा का कार्यक्रम बहुत सुबह शुरू हो जाता है। गोरक्ष पीठाधीश्वर सबसे पहले गुरु गोरखनाथ की पूजा अर्चना करते हैं। फिर सभी नाथ योगियों की समाधि पर जाकर पूजा करते हैं। उसके बाद सामूहिक आरती की जाती है। पूजा के बाद पीठाधीश्वर अपने शिष्यों के बीच होते हैं। पहले सभी शिष्य बारी बारी से गुरु के पास जाकर उन्हें तिलक लगाते थे और उनका आशीर्वाद लेते थे। इस बार ऐसा नही होगा। करोना के चलते तिलक की परंपरा में बदलाव किया गया है।
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नाथ पंथ में गुरु शिष्य परंपरा का बहुत ही महत्व
नाथ पंथ में गुरु शिष्य  परंपरा का बहुत ही महत्व है। जिस परंपरा की शुरूआत गुरु गोरखनाथ्ज्ञ ने किया था उसका पालन आज भी गोरक्ष पीठाधीश्वर और नाथ पंथ से जुड़े लोग कर रहे हैं। नाथ पंथ के जानकार कहते हैं कि नाथ परंपरा के मूल में योग है। योग के मूल में गुरु शिष्य परंपरा समारहित है। योग पूरी तरह से व्यवहारिक क्रिया पर आधारित है। बिना गुरु के योग कोसाधना असंभव है। योग की परम्परा को अगली पीढ़ी में हस्तांतरित करने के लिए नाथ पंथ की स्थापना के समय से ही गुरु शिष्य परम्परा अनिवार्य रूप से जुड़ी है।

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