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गोरखपुर: सरकारी तंत्र की 'तीसरी आंख' में 'मोतियाबिंद', भगवान भरोसे चल रहा है काम
Tue, 05 Oct 2021 11:50 AM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 05 Oct 2021 11:50 AM IST
सार
बड़ी वारदात में सरकारी संस्थाओं के सीसीटीवी कैमरों से मदद नहीं मिल पाता है। प्रशासन प्राइवेट संस्थाओं को प्रेरित करता है, लेकिन खुद में सुधार की कोशिश नहीं करता है।
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बीआरडी गेट पर लगा सीसीटीवी खराब है।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
गोरखपुर की पुलिस ने अहम मौकों पर जब भी सरकारी तंत्र की ‘तीसरी आंख’ से मदद की उम्मीद की, उसे नाउम्मीदी ही मिली। आधुनिक दौर में भी सरकारी संस्थानों में लगे सीसीटीवी कैमरे बेकार साबित हो रहे हैं। ऐसे में प्राइवेट संस्था या दुकानों में लगे सीसीटीवी कैमरे के भरोसे ही पुलिस का काम चलता है।
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अक्सर, बड़ी वारदात होने पर पुलिस सबसे पहले सीसी टीवी फुटेज से सुराग तलाशने की कोशिश करती है, लेकिन उसे सरकारी परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों से मायूस ही होना पड़ता है। मनीष गुप्ता हत्याकांड में बीआरडी मेडिकल कॉलेज पहुंची एसआईटी के सामने इसी तरह की हकीकत सामने आई है।
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मनीष गुप्ता की मौत की जांच के लिए कानपुर एसआईटी रविवार को मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर पहुंची तो पता चला कि सीसीटीवी कैमरे लंबे समय से खराब हैं। मुख्य गेट से लेकर अंदर ट्रॉमा सेंटर तक का एक भी कैमरा नहीं चल रहा था।
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ठीक इसी तरह गोरखपुर विश्वविद्यालय परिसर में प्रियंका की खुदकुशी की तफ्तीश में जब पुलिस टीम ने वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की तरह उम्मीद से देखा तो नाउम्मीदी ही हाथ आई। 30 अगस्त को गोरखपुर यूनिवर्सिटी के गृह विज्ञान विभाग के स्टोर रूम के पास फंदे से लटकी मिली थी छात्रा प्रियंका की लाश।
जांच के लिए सीसीटीवी कैमरे खोजे गए तो पता चला कि कोई कैमरा नहीं है। यही वजह है कि पुलिस को इस मौत का राज उजागर करने के लिए लखनऊ से एफएसएल टीम को बुलाना पड़ा। बाद में जांच में खुदकुशी की पुष्टि हुई।