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Gorakhpur News: 'महाभोज' और 'राग दरबारी' जैसी कालजयी कृतियों को मंच पर दी नई धड़कन

Tue, 15 Sep 2026 02:22 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Tue, 15 Sep 2026 02:22 AM IST
सार

गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष रहीं प्रो. रस्तोगी ने साहित्य, नाट्य लेखन और रंगमंच को एक साथ साधते हुए शहर की सांस्कृतिक चेतना को नई जमीन दी। प्रो. रस्तोगी ने वर्ष 1968 में रूपांतर नाट्य मंच की नींव रखी थी। उनके लिए रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति था।

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Breathed new life onto the stage into timeless works like 'Mahabhoj' and 'Raag Darbari'.

विस्तार

बात जब हिंदी के विकास और उसकी यात्रा की होगी, तो इसके संवर्धन में अद्वितीय योगदान देने वालों में गोरखपुर विश्वविद्यालय की प्रो. गिरीश रस्तोगी का जिक्र भी जरूर आएगा। उन्होंने हिंदी की कालजयी कृतियों मन्नू भंडारी के 'महाभोज' और श्रीलाल शुक्ल के 'राग दरबारी' का ऐसा बेजोड़ नाट्य रूपांतरण किया, जिसने साहित्य को किताबों के बंद पन्नों से निकालकर आम जनता के बीच रंगमंच पर जीवंत कर दिया।

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गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आचार्य रहते हुए उन्होंने न केवल रंगमंच और हिंदी के अंतर्संबंधों को अकादमिक गहराई दी, बल्कि पूर्वांचल में थियेटर की एक पूरी नई पीढ़ी भी तैयार की। रंगमंच की लौ से आज भी रोशन उनकी स्मृतियां यह साबित करती हैं कि शब्दों को अभिनय की धड़कन देने वाली उनकी नाट्य दृष्टि और साधना हमेशा अमर रहेगी।
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रंगमंच को जीवन की अभिव्यक्ति और साहित्य को समाज का दर्पण मानने वाली प्रो. गिरीश रस्तोगी की स्मृतियां आज भी गोरखपुर के रंगकर्म में जीवंत हैं। उनके सृजनात्मक अवदान को रूपांतर नाट्य मंच आज भी नाट्यांजलि के माध्यम से आगे बढ़ा रहा है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष रहीं प्रो. रस्तोगी ने साहित्य, नाट्य लेखन और रंगमंच को एक साथ साधते हुए शहर की सांस्कृतिक चेतना को नई जमीन दी। प्रो. रस्तोगी ने वर्ष 1968 में रूपांतर नाट्य मंच की नींव रखी थी। उनके लिए रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति था।

प्रो. रस्तोगी की संस्था से जुड़े अधिकांश सदस्य उनके विद्यार्थी रहे हैं। उनके शिष्यों ने गुरु की रंग-परंपरा को मंच पर जीवित रखने के साथ नई पीढ़ी को भी इससे जोड़ने का प्रयास शुरू किया है।

प्रो. रस्तोगी की स्मृति में रूपांतर नाट्य मंच की ओर से प्रो. गिरीश रस्तोगी सम्मान शुरू किया गया है। हर वर्ष अक्तूबर में गोरखपुर में नाटक का मंचन कर उन्हें नाट्यांजलि दी जाती है। लखनऊ में रंग-ए-आवारगी का आयोजन भी उनकी रंग-साधना को समर्पित रहता है। 16 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाती है, जिसमें साहित्य और रंगमंच से जुड़े विद्वान उनके रचनात्मक अवदान पर विमर्श करते हैं।

संस्था के अधिकांश सदस्य प्रो. रस्तोगी के विद्यार्थी रहे हैं। अब युवाओं को जोड़कर उनकी रंग-दृष्टि और सांस्कृतिक विरासत को आगे ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रो. रस्तोगी वर्ष 1961 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से जुड़ी थीं।


16 जनवरी 2015 को प्रयागराज में उनके निधन के बाद भी उनके शिष्यों और रंगकर्मियों के लिए उनका साहित्य और रंगचिंतन प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उनकी स्मृति अब किसी एक व्यक्ति की स्मृति नहीं बल्कि गोरखपुर की रंग-संस्कृति की सतत परंपरा बन चुकी है: निशिकांत पांडेय, सचिव, रूपांतर नाट्य मंच

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