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बीएनएस: नए कानून की पाठशाला फिर से गोरखपुर की कचहरी में, बुजूर्ग दिग्गज भी कर रहे पढ़ाई, रट रहे धारएं

Wed, 03 Jul 2024 10:20 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Wed, 03 Jul 2024 10:20 AM IST
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After 50 years in the Gorakhpur court, peeping into the law books again
दीवानी कचहरी में नए कानून की किताब का अध्ययन करते अधिवक्ता - फोटो : अमर उजाल
तकरीबन 50 साल बाद दीवानी कचहरी में एक बार फिर कानून की किताबों में ताकझांक होने लगी है। अधिवक्ताओं के टेबल पर नजर दौड़ाएं तो कानून की दो तरह की किताबें नजर आती हैं। एक नए तो एक पुराने कानून वाली। साथ ही नजर आते हैं इन किताबों पर नजर जमाए अधिवक्ता। मंगलवार को कचहरी में दिनभर नए और पुराने कानून की गूंज ही सुनाई देती रही।
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वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मानें तो 1973 में नए कानून के लागू होने के बाद भी ऐसे ही हालत थे। हर तख्ते पर दो-दो किताबें। वारदात को लेकर दो तरह की धाराओं का जिक्र। घटना कब की है, दस्तावेज तैयार करने में पीड़ित से सवाल-जवाब। वारदात की जो धाराएं जुबान पर रहती थीं, अब उसके लिए कानून के जानकारों को कानून की किताब का सहारा लेना पड़ रहा है।
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After 50 years in the Gorakhpur court, peeping into the law books again
चेंबर में अधिवक्ता प्रार्थना पत्र लिखने से पहले नई धारा का किताब से मिलान करते हुए - फोटो : अमर उजाला
वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज शाही के तख्ते पर कुछ फरियादी और तीन-चार जूनियर अधिवक्ता मौजूद थे। अधिवक्ता विनोद कुमार आजाद मारपीट के एक केस से संबंधित कागजात तैयार कर रहे थे। धारा पर आकर अटक गए। सहयोगी से बोले-जरा बीएनएस की किताब में देखो कि नए कानून के तहत कौन सी धारा लगेगी। अब तो बड़ा ध्यान रखना पड़ेगा। वरना आईपीसी की धारा ही अभी याद है।

कानून के विशेषज्ञ वरिष्ठ अधिवक्ता रमापति शुक्ल बताते हैं -1968 में कानून में बदलाव हुआ था। उस दौरान मेरी प्रैक्टिस करीब पांच साल की थी। कुछ दिनों तक परेशानी होती है। हम लोगों ने कानून की किताब का पूरा अध्ययन किया था। आज नए अधिवक्ताओं को भी चाहिए कि वे नए कानून को पहले पढ़ें। चुनौतियां तो आती हैं पर धीरे-धीरे अभ्यास में आ जाएगा।

अधिवक्ता कृष्ण दीपक ने कहा-अचानक हुए बदलाव के कारण इसे रट पाना आसान नहीं होगा। कागजात तैयार करते समय अभी आईपीसी की धारा ही लिख दे रहा हूं। यह गलती होने की वजह से बार-बार नए पेपर का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अभी एक प्रार्थनापत्र बनाना था, उसमें पुरानी धारा का उल्लेख हो गया था, जबकि घटना दो जुलाई की थी। फिर प्रार्थनापत्र फाड़कर दूसरा लिखना पड़ा।



 

After 50 years in the Gorakhpur court, peeping into the law books again
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
तभी वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज शाही आए, उन्होंने प्रार्थनापत्र को दोबारा चेक किया। इसके बाद उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने बताया कि कानूनी काम में लिखा-पढ़ी में छोटी-छोटी बातों का ध्यान देना पड़ता है। कहीं गलती हो जाए तो केस पर उसका असर पड़ता है।

दोपहर दो बजे के करीब दीवानी कचहरी में लंच हुआ था। अधिकतर अधिवक्ता उस समय कैंटीन में चाय-नाश्ते के साथ बीएनएस पर ही चर्चा करते दिखे। वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र द्विवेदी अपने एक-दो जूनियर को
बीएनएस की नई किताब लेकर पढ़ने के लिए बैठाए हुए थे।

उन्होंने कहा-नए मुकदमे को दाखिल करने में दिक्कत आएगी। मेरे पास एक नया मामला था, लेकिन समझ में नहीं आया तो उसे दाखिल नहीं किया। कोर्ट में
जिरह के समय भी अधिवक्ता आपस में मजाक कर रहे हैं कि नया वाला है कि पुराना मामला है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

वरिष्ठ अधिवक्ता यशपाल सिंह ने बताया कि मैंने कानून की पढ़ाई पूरी कर 1987 में वकालत शुरू की। मेरे सीनियर बताते थे कि जब 1973 में कानून में संशोधन हुआ था, तब भी बहुत असमंजस जैसी स्थिति थी। हालांकि, उस समय आंशिक संशोधन ही हुआ था।

अब कई अहम धाराएं बदल गई हैं। वर्तमान में एक जुलाई से लागू नए आपराधिक कानून को जानने एवं समझने के लिए सभी अधिवक्ताओं को दोनों कानून के फर्क को समझना पड़ेगा। इसके लिए पढ़ने की जरूरत है, ताकि दस्तावेजों को तैयार कर करने में असहजता न आए।

वरिष्ठ अधिवक्ता पीके दूबे ने बताया कि आईपीसी की सभी धाराएं याद हो गई थीं। उसी के अंतर्गत सभी केस देखता था। बहुत कम ही ऐसा होता है कि किताब देखनी पड़ी हो। मुवक्किल जैसे ही घटना के बारे में बताते हैं, प्रार्थनापत्र सुंसगत धाराओं में तैयार करवा देता था। अब नया कानून आने के बाद असमंजस तो है। कई बार किताबें देखनी पड़ रही हैं। अगर गलत हो जाए तो अर्जी ही खारिज हो जाएगी।
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