Thar Netflix Review: हर्षवर्धन को स्टार बनाने की एक और कोशिश, थार की दृश्यावलियों में खो गई कहानी
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बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही फिल्म ‘केजीएफ 2’ का एक संवाद है, ‘मेरिट से आए हैं भाई, अपुन को भी थोड़ा रेसपेक्ट दे ना भाई!’ रेसपेक्ट यानी इज्जत या कहें कि प्रतिष्ठा बड़ी चीज है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में। पैसे से ज्यादा लोग इसी के पीछे भागते हैं। अनुराग कश्यप को इसका लंबा अनुभव भी रहा है। उन्हें क्वेंटिन टैरेंटिनो का देसी संस्करण बताने वाले तमाम पत्रकार अब किसी न किसी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी हिस्सा बन चुके हैं। फिल्म ‘थार’ को देखने का स्वाद भी फिल्म की कास्टिंग में उनका नाम आते ही बदलने लगता है। पहले फिल्म उनको ‘स्पेशल थैंक्स’ देती है और फिर वह संवाद लेखक के रूप में भी सामने आते हैं और साथ ही आता है फिल्म का वह सीन जो सीधे ‘देव डी’ से मारा हुआ लगता है। अपने आशिक से मिलने के लिए गांव की छोरी इस बार गद्दा तो नहीं हां, लालटेन जरूर लेकर आई है। ‘मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने’ टाइप के इस सीन से ही आगे की फिल्म का पूरा खाका साफ हो जाता है।
हर्षवर्धन के लिए पिता ने बनाई फिल्म
फिल्म ‘थार’ अपने जमाने के सुपरस्टार रहे अभिनेता अनिल कपूर ने अपने बेटे हर्ष वर्धन कपूर को स्टार बनाने के लिए बनाई है। नेटफ्लिक्स की बलिहारी है कि हर महीने 499 रुपये का बिल फाड़ने के बाद वह ऐसी फिल्में परोसता जा रहा है। इस ओटीटी पर दिल खुश कर देने वाली आखिरी हिंदी फिल्म या वेब सीरीज अब तक ‘द फेम गेम’ ही रही है। फिल्म ‘थार’ जैसा कि नाम से जाहिर है राजस्थान के मरुस्थल थार की पृष्ठभूमि पर बनी है। एक पुलिस इंस्पेक्टर है जो ‘बालिका वधू’ में दादी सा बनी सुरेखा सीकरी की याद दिलाने के लिए ही शायद अपना नाम सुरेखा रखता है। आवाज उसकी कहानी का सिरा सन 47 से क्यों पकड़ती है, वह ही जाने क्योंकि किस्सा ये सन 85 का है। गांव में कत्ल हो रहे हैं। वह इनके सबूतों के हिसाब से अपराधी कम तलाशता है, भविष्यवाणियां ज्यादा करता है। पन्ना, धन्ना की तलाश में भटकता एक और छोरा है जिसकी निगाहें पुरानी चीजों पर कम और दूसरों की लुगाइयों पर ज्यादा टिकती हैं। कहानी इन्हीं सब दृश्यावलियों में कहीं भटककर रह जाती है।
राज सिंह चौधरी का कमजोर निर्देशन
नेटफ्लिक्स की नई फिल्म ‘थार’ का डीएनए इसे बनाने वाले राज सिंह चौधरी के संघर्ष जैसा है। वह अनुराग कश्यप स्कूल से निकले फिल्ममेकर हैं। ‘सत्या’ के दिनों में अनुराग से प्रभावित हुए। मॉडलिंग के बाद कारोबारी बने और फिर सिनेमा बनाने मुंबई आ पहुंचे। कहते हैं कि फिल्म ‘गुलाल’ की असल कहानी उन्हीं की लिखी हुई थी। राज सिंह चौधरी पर अनिल कपूर जैसे कलाकार ने अपने बेटे का करियर सेट करने के लिए भरोसा किया तो उनमें कुछ तो खास बात जरूर होगी। हालांकि, ये खास बात फिल्म ‘थार’ देखने से साफ हो जाती है। राज सिंह चौधरी दृश्यावलियों की कल्पना करने वाले निर्देशक हैं। कहानी उनकी फिल्ममेकिंग की प्राथमिकता में कहीं बाद में आती है। डेविड अटनबरो की किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह शुरू होने वाली फिल्म ‘थार’ में चील और मुर्रा भैंस वाले सीन ही वाकई में अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं।
नहीं जमी बाप-बेटे की जुगलबंदी
नेटफ्लिक्स की इस फिल्म को लोग शुक्रवार को आधी रात से खोजते रहे। फिल्म आधी दोपहर को रिलीज हुई। कनपटी के सफेद बाल वाले अनिल कपूर ने अपने बेटे हर्षवर्धन को जरूर कभी हॉलीवुड स्टार बनाने का सपना देखा होगा, तभी तो अनुराग कश्यप के इस संदर्भ में लिखे संवाद को उन्होंने फिल्म में रहने दिया। बाप बेटे इसके पहले अनुराग की फिल्म ‘एके वर्सेज एके’ में अच्छी जुगलबंदी दिखा चुके हैं। यहां मामला कहानी के स्तर पर ही मात खा जाता है। फिल्म बनाने वाले इसकी रिलीज से पहले बताते रहे है कि ये ‘द गुड, द बैड एंड द अगली’ वाले लुक की फिल्म है। पश्चिमी सिनेमा की ये एक खास शैली है। उसके बैकग्राउंड म्यूजिक जैसा कुछ कुछ फिल्म ‘थार’ में भी बजता रहता है। लेकिन, धूसर, भूरे और लाल रंगों में तैरती ये फिल्म शुरू के 20 मिनट में ही अपना असर खोना शुरू कर देती है।
‘अंडर कंस्ट्रक्शन’ कलाकार हर्षवर्धन
कलाकारी के लिहाज से हर्ष वर्धन कपूर पूरी कोशिश करते हैं एक अच्छा अभिनेता साबित होने की। अदाकारी की रेंज भी उनमें विकसित होने लगी है। लेकिन वह अभी ‘अंडर कंस्ट्रक्शन’ कलाकार हैं। उनके अंदर अभिनय की अपने पिता जैसी नैसर्गिक प्रतिभा का उदय होना बाकी है। अनिल कपूर ने बेटे के लिए जितना बन पड़ा उतना किया लेकिन लोगों को जिस खिलंदड़ अनिल कपूर को देखने की आदत है, वह इस फिल्म में ‘मिसिंग’ है। फातिमा सना शेख और सतीश कौशिक के किरदारों पर और तवज्जो दी जानी चाहिए थी। खाकी वर्दी पहने हवलदार के मन में इतनी उम्र के बाद भी बजबजाती जाति व्यवस्था के तेवर और दिखने चाहिए थे। फातिमा के किरदार का भी आगा पीछा थोड़ा और विकसित होता तो वह कहानी में अपनी चमक बेहतर कर सकती थीं।
देखें कि ना देखें...
‘थार’ फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी सिनेमैटोग्राफी। श्रेया देव दुबे ने फिल्म को ठीक वैसा ही परोसा है जैसा इसे बनाने वालों ने रिलीज के पहले के अपने इंटरव्यू में दावा किया। राजस्थान अक्सर फिल्मों में रंगीला ही दिखता रहा है। इतना मिर्जापुरिया राजस्थान परदे पर कम ही दिखा। बड़े परदे पर इस फिल्म को देखना वाकई दिलचस्प होता। आरती बजाज का संपादन दुरुस्त है। बस, 90 मिनट की अवधि का लक्ष्य लेकर बनी फिल्म उससे 18 मिनट फालतू हो गई है। अजय जयंती के संगीत पर हॉलीवुड फिल्मों का असर साफ दिखता है। करने को कुछ ना हो तो ये फिल्म टाइमपास करने के लिए ही देखी जा सकती है।