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कहीं भाजपा से छिन न जाए ‘हर्ष’ होने का मौका

Fri, 18 Oct 2013 02:07 AM IST
राकेश भट्ट/नई दिल्ली
राकेश भट्ट/नई दिल्ली Updated Fri, 18 Oct 2013 02:07 AM IST
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does BJP not lose much 'harsh' chance of being

नई दिल्ली में गुटबाजी के लिए सुर्खियों में रहने के बावजूद तमाम सर्वे बता रहे थे कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछले चुनाव के मुकाबले फायदे में रहेगी।

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लेकिन, अचानक से सीएम के लिए डॉ. हर्षवर्धन को प्रोजेक्ट करने की बात आई और नेताओं व कार्यकर्ताओं के बीच तलवारें खिंच गईं।

आलम यह है कि क्षेत्र को खाली छोड़कर कार्यकर्ताओं के अलावा टिकट के दावेदार भी अपने-अपने नेताओं की लामबंदी में जुट गए हैं।

इसका असर आज से शुरू हुए ‘चलो बूथ की ओर’ अभियान पर भी दिखा है। वहीं, कुर्सी की इस खींचतान में आलाकमान भी चिंता में है।

इस बार प्रदेश चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी की नीतियों के चलते भाजपा में गुटबाजी पर विराम लगा हुआ था।

दरअसल, पार्टी ने तय किया था कि वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में वीके मल्होत्रा को सीएम प्रोजेक्ट किए जाने के बाद आए खराब परिणाम के कारण इस बार पार्टी किसी का नाम आगे न करके चुनाव लड़ेगी।
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ऐसा चल भी रहा था, लेकिन संगठन के 14 जिलाध्यक्ष व 280 मंडल अध्यक्षों के पद पर अपने लोग बिठाने के बाद प्रदेशाध्यक्ष विजय गोयल की मुख्यमंत्री बनने को लेकर महत्वकांक्षा बढ़ गई।
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मोदी की रैली में भी गोयल खुद को सीएम प्रोजेक्ट करते दिखे। यही वजह रही कि दूसरे गुट सक्रिय हो गए और अचानक डॉ. हर्षवर्धन को सीएम उम्मीदवार बनाने की बात सामने आई।

कार्यकर्ताओं के बीच बवाल होने पर गडकरी ने यह तो कहा कि सीएम के नाम पर फैसला संसदीय बोर्ड करेगा, लेकिन किसका नाम होगा या नहीं इस पर कुछ नहीं बोले।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह व गडकरी के बीच हुई बातचीत के बाद गडकरी ने बयान जारी किया, लेकिन उससे गोयल समर्थक संतुष्ट नहीं हुए।

इतना ही नहीं गोयल ने गडकरी को कह दिया कि डॉ. हर्षवर्धन का नाम घोषित होने पर वे प्रदेशाध्यक्ष व चुनाव से किनारा कर लेंगे। अब विदेश गए अरुण जेटली का इंतजार किया जा रहा है। संभवत: रविवार को इस मसले पर पार्टी निर्णय लेगी।

उधर, डॉ. हर्षवर्धन पीएम इन वेटिंग नरेंद्र मोदी व संघ की पसंद बताए जा रहे हैं जबकि सूत्र बताते हैं कि यह बात सामने आने पर गोयल ने भी बीती रात संघ के पदाधिकारियों से संपर्क साधा।

संगठन के तमाम कार्यकर्ता भी पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय पर विरोध जताने पहुंच गए। ऐसे में चुनाव को लेकर रणनीति, प्रचार व उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया पर असर पड़ा है।


जाहिर है कि जब तक आलाकमान इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता, भाजपा के प्रचार का रथ थमा रहेगा। फिलहाल, कांग्रेस के टिकट वितरण में जुटने व आम आदमी पार्टी के जोरदार प्रचार अभियान के बीच भाजपा के लिए यह संकट की घड़ी है।

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