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बच्ची की हत्या में मिली मृत्युदंड की सजा रद्द
New Delhi
Updated Tue, 20 Nov 2012 12:00 PM IST
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नई दिल्ली। साढ़े छह वर्षीय लड़की से दुष्कर्म और उसकी हत्या कर हाथ पैर काटने में निचली अदालत से मिली मृत्युदंड की सजा को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना व न्यायमूर्ति एसपी गर्ग की खंडपीठ ने कहा पेश तथ्यों और डॉक्टरों की चिकित्सा रिपोर्ट का अध्ययन करने से स्पष्ट है कि वारदात के वक्त आरोपी नाबालिग था। जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के तहत नाबालिग को इस प्रकार की सजा नहीं दी जा सकती। उसे हत्या के मामले में भी दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष रिमांड होम या सुधार गृह में रखा जा सकता है। अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे फिलहाल जेल में काटी गई सजा के आधार पर रिहा करने से इनकार करते हुए उसके मुकदमे को बाल अदालत में चलाने का निर्देश दिया है अभियोजन पक्ष के अनुसार 14 अगस्त 2007 को साढ़े छह वर्षीय लड़की का क्षतविक्षत शव रोहिणी सेक्टर-7 के पास बने सुलभ शौचालय के पास मिला था। बच्ची से दुष्कर्म कर उसके हाथ पैर काट डाले गए थे। मृतका की छोटी बहन के बयान के आधार पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था। सेशन कोर्ट ने 10 फरवरी 2012 को उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई। निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। आरोपी ने तर्क रखा था कि वारदात के समय वह नाबालिग था, लेकिन ट्रायल कोर्ट में इस तथ्य पर फैसला नहीं हो पाया था। अदालत के आदेश के बाद डीडीयू अस्पताल के डॉक्टरों का बोर्ड बनाया गया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा आरोपी की आयु वारदात के समय 17 से 20 के बीच रही होगी। अदालत ने कहा कि कानून की नजर में उसकी आयु 17 वर्ष मानी गई। ऐसे में उसकी आयु बालिग होने से एक वर्ष कम थी। -
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