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...और भगत सिंह की किताब पूरी न कर पाए चंद्रा

Sun, 31 Aug 2014 11:26 AM IST
Updated Sun, 31 Aug 2014 11:26 AM IST
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Writer, historian bipin chandra passed away.

चर्चित इतिहासकार बिपिन चंद्रा के निधन के साथ ही भारतीय इतिहास लेखन के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया। उन्होंने शनिवार की सुबह करीब छह बजे गुड़गांव स्थित अपने नेशनल मीडिया सेंटर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। वह 86 वर्ष के थे। क्रांतिकारी भगत सिंह पर वह एक किताब लिख रहे थे, उनके आकस्मिक निधन से यह अधूरी रह गई।

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पिछले कुछ महीनों से उनकी तबियत नासाज चल रही थी। उन्हें मधुमेह की भी शिकायत थी। घर के नौकर ने बताया कि शुक्रवार की रात खाना खाने के बाद वे सोने चले गए। उन्हें रात 2:30 बजे थोड़ी परेशानी हुई। उन्हें नेबुलाइजर दिया गया।
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सुबह नींद में ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। देहांत के समय उनके पास परिवार का कोई सदस्य नहीं था।  उनकी पत्नी का तकरीबन चार वर्ष पूर्व देहांत हो चुका है। वह अपने पीछे दो बेटे छोड़ गए हैं। उनके बड़े बेटे बीनू चंद्रा अमेरिका में पढ़ाते हैं।
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दूसरे बेटे विकास चंद्रा उनके साथ ही रहते हैं। लेकिन, उनके देहांत के समय वे दिल्ली में अपने किसी रिश्तेदार के सगाई समारोह में गए हुए थे। बिपिन चंद्रा ने तकरीबन दो दर्जन किताबें लिखी हैं।

वह इतिहासकार ही नहीं एक महान आधुनिक विचाकर भी रहे हैं। जेएनयू के इतिहासकार प्रभात भटनागर बताते हैं कि वह निष्पक्ष विचारधारा वाले व्यक्ति थे। उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन को बेहद ठोस दृष्टिकोण दिया।

इस चलते उनकी किताबों के बिना भारतीय इतिहास का उल्लेख अधूरा माना जाता है। उनका जाना भारतीय इतिहास और शिक्षा जगत के लिए बड़ा शून्य माना जा रहा है। फिलहाल, देश में ऐसा कोई इतिहासकार नहीं, जो उनकी जगह ले सके।

सच लिखने-कहने से कभी नहीं डरे

Writer, historian bipin chandra passed away.

अक्सर उन्हें वामपंथी लेखक  सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। मगर उनके विचार काफी सटीक थे। वह सही बात लिखते और कहते थे। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पर भी निशाना साधा। सांप्रदायिकता पर उनके विचार काफी स्पष्ट थे। उन्होंने पंजाब में चले खालिस्तान के मुद्दे को सिख सांप्रदायिकता का नाम दिया था। वैसे ही केरल में ईसाई सांप्रदायिकता की बात लिखी थी।

कम हो गई थी आंखों की रोशनी
बिपिन चंद्रा के करीबी एवं जेएनयू के इतिहासकार राकेश भटव्याल बताते हैं कि उन्हें आंखों से दिखना लगभग बंद हो गया था। इस कारण वह परेशान रहते थे। पढ़ने-खिलने के शौकीन चंद्रा का इससे पठन-पाठन प्रभावित हो रहा था। वह भगत सिंह पर किताब लिख रहे थे, जो अधूरी रह गई।

कर्मकांड के हमेशा खिलाफ रहे
बिपिन चंद्रा का जीवन काफी सादा व सरल रहा। वह सदैव कर्मकांडों के खिलाफ रहे। उनके घर में केवल महात्मा गांधी की तस्वीर लगी दिखाई दी। उनके नजदीकी बताते हैं कि उनका धार्मिक कर्मकांड में विश्वास नहीं था। अपने शिष्यों के लिए वह सदैव चिंतित रहते थे। हर किसी के साथ खुद को जोड़ने की उनमें अभूतपूर्व क्षमता थी। आम हो या खास जिसने इनके बारे में सुन रखा था, निधन की खबर सुनकी उनके घर चला आया।

बिपन चंद्रा से जुड़े लोगों की राय

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बिपन चंद्रा एक महान इतिहासकार हैं। इनकी जगह कोई नहीं ले सकता। इनके जाने से इतिहास के एक युग का अंत हो गया। उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन को एक स्वतंत्र दृष्टिकोण प्रदान किया।
- केसी यादव, अध्यक्ष हरियाणा इतिहास अकादमी

खुद पर गर्व होता है कि मैं बिपिन चंद्रा जी का शिष्य हूं। उनका जाना एक बड़ा शून्य उत्पन्न कर गया है। जब वह अपने शिष्यों को पढ़ाते थे तो समय नहीं देखते थे। कई बार तो सात-सात घंटे गुजर जाते थे, पता ही नहीं चलता था। बड़े इतिहासकार होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्च भी बड़ा था। हर किसी की भावनाओं और इच्छाओं को पूरा करना उनकी आदत थी। कभी किसी के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया।
- राकेश भटव्याल, सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज जेएनयू

वर्ष 1989-1991 के दौरान मैं बिपिन चंद्रा के संपर्क में आया। वह महान इतिहासकार थे। उनके जाने का बहुत दुख है। उनकी लिखी किताबों ने कइयों की जिंदगी को बदल दिया। उनको सुनने के लिए लोग हमेशा लालायित रहते थे।
- डॉ. अशोक दिवाकर, शिक्षाविद्

एकपत्र लिखकर उनके करीब वर्ष 1992 में आया। उन्होंने अपना शिष्य बना लिया। जीवन के हर मोड पर उनका सहयोग मिला। सैकड़ों बार मुलाकात हुई। उनकी किताबें पढ़ना मुझे अच्छा लगता है। वह हमारे संरक्षक थे।
- आलोक वाजपेयी, लखीमपुर खीरी

बिपिन चंद्रा का सफर

Writer, historian bipin chandra passed away.

हिमाचल के कांगड़ा वैली में उनका जन्म 1928 में हुआ।
1951 से हिंदू कॉलेज में लेक्चर और रीडर रहे।
1971 से 1993 जेएनयू में इतिहास के प्रोफेसर के तौर पढ़ाया।
1985 में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
जेएनयू में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज के चेयरपर्सन भी रहे।
1993 में यूजीसी के सदस्य रहे।
नेशनल बुक ट्रस्ट को एक नया आयाम दिया।

बिपन चंद्रा की प्रमुख किताबें

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कम्युनिल्जम: अ प्राइमर
इन द नेम ऑफ डेमोक्रेसी: द जेपी मूवमेंट एंड न इमर्जेंसी
एसे ऑफ कलोनियालिज्म
इंडिया सिंस इंडिपेंडेंट
आइडियोलॉजी एंड पॉलिटिक्स इन मॉडर्न इंडिया
एसे ऑफ कांटेपोरेरी इंडिया
द इंडियन लेफ्ट: क्रिटिकल अप्रैजल
इंडियन नेशनल मूवमेंट: द लांग टर्म डाइनमिक्स
इंडियंस स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस 1857-1947
द मेकिंग ऑफ मॉर्डन इंडिया: फ्रॉम मार्क्स टू गांधी
फ्रीडम स्ट्रगल
हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया

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