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ये किसानों की कुश्ती लड़ने वाली बेटियां हैं, परिवार ही नहीं, अब देश भी बदलने को हैं तैयार

Sun, 10 Jan 2021 10:33 PM IST
संजीव कुमार झा अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 10 Jan 2021 10:33 PM IST
सार

  • यूपी गेट पर रविवार को हुई किसानों की कुश्ती प्रतियोगिता, महिला पहलवानों ने दिखाया गजब का उत्साह
  • किसान नेताओं ने कहा, सुप्रीम कोर्ट की आड़ में न छिपे सरकार, कानून खत्म करने से कम किसी विकल्प पर विचार संभव नहीं

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Wrestling daughters of farmers are ready to change country
बेटियां प्रदर्शन करती हुई - फोटो : amar ujala

विस्तार

खुशी पंवार की उम्र केवल 13 साल है। वे आठवीं कक्षा में पढ़ती हैं और उनके साथियों के मुताबिक पढ़ाई में काफी अच्छी हैं। वे बड़ेड़ी से किसानों के आंदोलन में शामिल होने यूपी बॉर्डर पर आई हैं। लेकिन सामान्य लड़कियों की तरह खुशी की पहचान केवल इतनी भर नहीं है। वे एक महिला पहलवान हैं और अब तक जिला स्तर पर कई पहलवानों को धूल चटा चुकी हैं।

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अपनी यही पहचान बताने में वे ज्यादा गर्व महसूस करती हैं। खुशी पंवार ने जैसे ही यूपी गेट पर किसान आंदोलन में चल रही कुश्ती प्रतियोगिता में अपने पुरुष प्रतिद्वंदी को क़ड़े मुकाबले में हराया, पूरी भीड़ किसान आंदोलन जिंदाबाद, भारत की बेटियां जिंदाबाद, वाह-वाह के नारे से गूंज उठा। उनकी जीत पर काफी देर तक तालियां बजती रहीं।
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अपनी जीत के बाद अमर उजाला से बातचीत करते हुए खुशी पंवार ने बताया कि वे एक किसान परिवार की बेटी हैं। पहलवानी करने पर पिता, भाई या परिवार के किसी सदस्य की तरफ से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि पिता तो कई बार कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उन्हें साथ भी लेकर जाते हैं। वे अकेली नहीं हैं, उनके साथ कई और भी लड़कियां हैं जो कुश्ती में अपना करियर बनाना चाहती हैं। बबिता फोगाट, गीता फोगाट बहनों ने लड़कियों के अंदर नई सोच पैदा कर दी है।
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एक महिला पहलवान के साथ आए सुशील तोमर ने बताया कि किसानों की सोच एकदम से बदल गई हो, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनकी पारंंपरिक सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है। अब वे पुरानी सोच में जकड़े किसान नहीं हैं। उन्हें देश-दुनिया में चल रही गतिविधियों की पूरी जानकारी है। यही कारण है कि इस किसान आंदोलन में किसानों का एक बदला ही रूप नजर आ रहा है जो उनकी पारंपरिक छवि से बिल्कुल अलग है।


बेटियों के बारे में तोमर ने बताया कि ये किसानों की कुश्ती लड़ने वाली बेटियां हैं। ये अब परिवार ही नहीं, देश को भी बदलने का माद्दा रखती हैं। केंद्र सरकार को इन बेटियों की भावना समझनी चाहिए और तीनों कानूनों को वापस ले लेना चाहिए। किसानों के इस बदले अंदाज ने सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।

उत्सव जैसा रंग

यूपी बॉर्डर पर चल रहे कृषि कानून विरोधी प्रदर्शन में रविवार को उत्सव जैसा रंग देखने को मिला जहां किसानों ने दंगल प्रतियोगिता का आयोजन किया। छोटे-बड़े महिला-पुरुष पहलवानों की बीच दर्जनों कुश्तियां हुईं। भीड़ ने जोश भरे नारे लगाकर पहलवानों का उत्साह बढ़ाया और ईनाम देकर उन्हें सम्मानित भी किया। सामान्य तौर पर यूपी गेट पर तीन से चार हजार किसानों का जमावड़ा रहा करता था, लेकिन रविवार को कुश्ती के आकर्षण में यहां भारी भीड़ इकट्टी हो गई।

'किसान जीत गए, दिल्ली हार गई'
दंगल के दौरान किसान पहलवानों का खूब जोश बढ़ा रहे थे। कुश्ती शुरू होने से पहले किसी पहलवान को दिल्ली तो किसी को मोदी, किसी को किसान और किसी को एक प्राइवेट कंपनी का मालिक बताकर पुकारने लगते। कुश्ती हो जाने के बाद नारा लगाते कि किसान जीत गए और दिल्ली (केंद्र सरकार) हार गई। दूर-दूर से आए किसानों का कहना था कि वे इसी तरह केंद्र सरकार को भी हराकर ही यहां से जाएंगे।

अस्थाई टेंट लगाए, लेकिन कानून वापसी पक्की

किसानों ने शुरूआती दौर में कपड़े, प्लास्टिक और तंबू के टेंट्स लगाए थे, लेकिन बीच में तीन-चार दिन लगातार बारिश होने पर किसानों को भारी परेशानी हुई। अब किसान आंदोलन में नए आधुनिक टेंट्स लगाए जा रहे हैं जिन्हें ज्यादातर सेना के जवान या पर्वतारोही अपने साथ लेकर जाते हैं। इन टेंट्स में विपरीत मौसम के बीच भी ज्यादा परेशानी नहीं होती है। किसानों का कहना है कि ये टेंट्स तो अस्थाई हैं और कुछ दिनों में उखड़ जाएंगे, लेकिन वे सरकार से ऐसे कानून बनवाकर जाएंगे जो पक्के होंगे।

सुप्रीम कोर्ट के पीछे न छिपे केंद्र सरकार
किसान नेता अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार को अब यह समझ आ गया है कि किसान कानून को खत्म करने से कम किसी विकल्प पर विचार नहीं करेंगे। यही कारण है कि अब वह सुप्रीम कोर्ट के पीछे छिपकर आंदोलन को खत्म कराने का रास्ता खोज रही है। लेकिन सरकार की यह कोशिश कामयाब नहीं होगी। किसान नेता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट किसी कानून की वैधता को चेक कर सकता है, लेकिन कोई कानून किसानों को चाहिए या नहीं, इसका निर्णय किसान ही करेंगे।


अविक साहा ने कहा कि केंद्र में जनता की चुनी हुई सरकार है और उसे जनता की समस्याओं का समाधान स्वयं खोजना पड़ेगा। वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि सुप्रीम कोर्ट किसी कानून से सहमत है या नहीं। उन्होंने कहा कि कृषि कानून किसानों की समस्याओं का समाधान करने वाले नहीं हैं और ये उसे समस्याओं के नए जाल में उलझाने वाले हैं। ऐसे में इन कानूनों के खात्मे के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार करना संभव नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट सोमवार को किसान आंदोलन पर एक महत्त्वपूर्ण मामले की सुनवाई करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद शाम को किसान नेता एक बैठक कर आंदोलन की अगली रणनीति तय करने वाले हैं। ऐसे में किसानों की इस बैठक को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।

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