खराब चुनाव प्रबंधन बना इनेलो के हार की वजह
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गुड़गांव लोकसभा सीट से इनेलो को मिली भारी शिकस्त ने इसके चुनावी प्रबंधन एवं संगठनात्मक स्थिति की पोल खोल दी है। इसमें झोल के कारण ही पराजय का अंतर पिछले चुनाव से कहीं अधिक है।
पूरे चुनाव में इनेलो प्रत्याशी के इर्दगिर्द उनके परिवार और दल के चंद लोग घूमते रहे। चुनाव प्रचार प्रबंधन कितना लचर था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि गुड़गांव शहर के कई बूथों पर इनेलो प्रत्याशी को सैकड़े में भी वोट नहीं पड़े।
बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र में इनेलो के जाकिर हुसैन को कई बूथों पर आम आदमी पार्टी से भी कम वोट पड़े। मतगणना के तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें राउंड में इनेलो, आम आदमी पार्टी से भी पीछे था। सोहना के छठे राउंड में इनेलो से कहीं अधिक वोट बसपा को मिले।
जाकिर से ज्यादा मेहनत अभय चौटाला ने की
पूरे चुनाव में इनेलो प्रत्याशी मेवात के इर्दगिर्द ही घूमते रहे। इसमें संदेह नहीं कि इसका उन्हें लाभ मिला। नूंह विधानसभा क्षेत्र में उन्हें सर्वाधिक 79 हजार, फिरोजपुर झिरका में 92 हजार के करीब वोट मिले।
राजनीतिक विश्लेषकों की समझ है कि जाकिर को मेवात की जगह गुड़गांव एवं रेवाड़ी पर ध्यान देना चाहिए था। लेकिन वे इन क्षेत्रों के अधिकतर हिस्से में नहीं गए। इनके अलावा संगठन का भी कोई नेता प्रचार करता नहीं दिखा।
पार्टी नेता तभी सड़क पर आते थे जब इनेलो के विधायक एवं वरिष्ठ नेता अभय चौटाला गुड़गांव के दौरे पर आया करते थे। इस व्यवस्था से एक नाराज नेता का यहां तक कहना है कि स्थानीय नेताओं से अधिक परिश्रम प्रत्याशी के प्रचार में अभय चौटाला ने की।
मजबूत संगठन ने जिताया राव इंद्रजीत को
संगठन की कमजोरी के कारण ही इनेलो के गढ़ बावल में भी इनेलो का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। दूसरी तरफ प्रबंधन के नजरिए से भाजपा के राव इंद्रजीत सिंह बाजी मार गए।
उनका चुनाव प्रचार बेहद व्यवस्थित रहा। यहां तक कि उनके दो दिनों पहले के कार्यक्रम की जानकारी भी कार्यकर्ताओं को एसएमएस से दे दी जाती थी।
प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम में एक खास रणनीति और समय के अनुसार रखा गया। इस लिहाज से भी इनेलो फिसड्डी रही। इसकी स्थिति थी कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को भी पता नहीं होता था कि आज और अभी उसका प्रत्याशी कहां क्या कर रहा है।