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Delhi NCR News: विश्व हृदय दिवसः दिल की छिपी सूजन का अब पहले चल सकेगा पता
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-एम्स के अध्ययन में उन्नत कार्डियक एमआरआई से दिल की मांसपेशियों में सूक्ष्म बदलावों के मिले पहले ही संकेत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हृदय की मांसपेशियों में छिपी सूजन (कार्डियक सारकॉइडोसिस) से पीड़ित मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अब सूजन और शुरुआती क्षति का पता लगाया जा सकेगा। यह सब होगा उन्नत कार्डियक एमआरआई तकनीक से। इससे बीमारी के कारण हृदय को होने वाले नुकसान का आकलन करने, मरीजों की निगरानी और भविष्य में होने वाले जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इस संबंध में एम्स दिल्ली के कार्डियोवस्कुलर रेडियोलॉजी एंड एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशंस, कार्डियोलॉजी और जीरियाट्रिक मेडिसिन विभाग ने संयुक्त अध्ययन किया है।
यह अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग में प्रकाशित हुआ है। हालांकि, इसमें केवल 19 मरीजों को शामिल किया गया था, इसलिए इसके निष्कर्ष शुरुआती स्तर के हैं। डॉक्टरों के अनुसार, हृदय की मांसपेशियों में होने वाले बदलावों की पहचान में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। एम्स के कार्डियोवस्कुलर रेडियोलॉजी एंड एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशंस विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अमरिंदर सिंह मल्ही ने बताया कि कार्डियक एमआरआई में टी-1 मैपिंग, टी-2 मैपिंग और लेट गैडोलीनियम एन्हांसमेंट (एलजीई) को शामिल करने से हृदय की मांसपेशियों पर बीमारी के प्रभाव का बेहतर आकलन किया जा सकता है।
68 फीसदी मरीजों को थी धड़कन तेज होने की शिकायत
अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत उम्र 38 वर्ष थी। 68.4 फीसदी मरीजों को दिल की धड़कन तेज या अनियमित होने की समस्या थी, जबकि 52.63 फीसदी मरीजों को सांस फूलने की शिकायत थी। एमआरआई जांच में 63.15 फीसदी मरीजों में एलजीई के संकेत मिले। इनमें बीमारी का असर मुख्य रूप से हृदय की मांसपेशियों के बीच वाले हिस्से और बाहरी परत के पास देखा गया।
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-टी-1 मैपिंग में 1,029 मिलीसेकंड के कटऑफ पर प्रभावित हिस्सों की पहचान की संवेदनशीलता 87.5 फीसदी और विशिष्टता 96.9 फीसदी रही। वहीं, एलजीई में सामान्य दिखने वाले सात मरीजों में टी-1 मैपिंग ने हृदय के 112 हिस्सों में से 38 में असामान्यता के संकेत दिए। इन सभी मरीजों में कम से कम एक प्रभावित हिस्सा मिला। पीईटी जांच कराने वाले दोनों मरीजों में हृदय की सक्रिय सूजन की पुष्टि हुई।
एमआरआई से बीमारी की सक्रियता का आकलन
अध्ययन में एमआरआई और पीईटी-सीटी दोनों जांच कराने वाले दस मरीजों में एमआरआई ने पांच और पीईटी ने आठ मरीजों में सक्रिय बीमारी का पता लगाया। हालांकि, दोनों जांचों के परिणामों में अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, संदिग्ध कार्डियक सारकॉइडोसिस में टी-1, टी-2 मैपिंग और एलजीई का संयोजन हृदय की भागीदारी का पता लगाने में उपयोगी हो सकता है। अध्ययन टीम में डॉ. विनीता ओझा, डॉ. दिनकर भसीन, डॉ. विश्वजीत सिंह और डॉ. अरुण शर्मा सहित कई अन्य डॉक्टर शामिल थे।
कार्डियक सारकॉइडोसिस के लक्षण
डॉ. मल्ही के अनुसार, सारकॉइडोसिस सूजन संबंधी बीमारी है, जो शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। हृदय में इसका असर गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। शुरुआती चरण में कई मरीजों में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। बीमारी बढ़ने पर धड़कन अनियमित होना, हृदय की विद्युत गतिविधि में गड़बड़ी, पंपिंग क्षमता कम होना और हार्ट फेल्योर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ मामलों में अचानक हृदय संबंधी मृत्यु का जोखिम भी रहता है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हृदय की मांसपेशियों में छिपी सूजन (कार्डियक सारकॉइडोसिस) से पीड़ित मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अब सूजन और शुरुआती क्षति का पता लगाया जा सकेगा। यह सब होगा उन्नत कार्डियक एमआरआई तकनीक से। इससे बीमारी के कारण हृदय को होने वाले नुकसान का आकलन करने, मरीजों की निगरानी और भविष्य में होने वाले जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इस संबंध में एम्स दिल्ली के कार्डियोवस्कुलर रेडियोलॉजी एंड एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशंस, कार्डियोलॉजी और जीरियाट्रिक मेडिसिन विभाग ने संयुक्त अध्ययन किया है।
यह अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग में प्रकाशित हुआ है। हालांकि, इसमें केवल 19 मरीजों को शामिल किया गया था, इसलिए इसके निष्कर्ष शुरुआती स्तर के हैं। डॉक्टरों के अनुसार, हृदय की मांसपेशियों में होने वाले बदलावों की पहचान में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। एम्स के कार्डियोवस्कुलर रेडियोलॉजी एंड एंडोवैस्कुलर इंटरवेंशंस विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अमरिंदर सिंह मल्ही ने बताया कि कार्डियक एमआरआई में टी-1 मैपिंग, टी-2 मैपिंग और लेट गैडोलीनियम एन्हांसमेंट (एलजीई) को शामिल करने से हृदय की मांसपेशियों पर बीमारी के प्रभाव का बेहतर आकलन किया जा सकता है।
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68 फीसदी मरीजों को थी धड़कन तेज होने की शिकायत
अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत उम्र 38 वर्ष थी। 68.4 फीसदी मरीजों को दिल की धड़कन तेज या अनियमित होने की समस्या थी, जबकि 52.63 फीसदी मरीजों को सांस फूलने की शिकायत थी। एमआरआई जांच में 63.15 फीसदी मरीजों में एलजीई के संकेत मिले। इनमें बीमारी का असर मुख्य रूप से हृदय की मांसपेशियों के बीच वाले हिस्से और बाहरी परत के पास देखा गया।
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-टी-1 मैपिंग में 1,029 मिलीसेकंड के कटऑफ पर प्रभावित हिस्सों की पहचान की संवेदनशीलता 87.5 फीसदी और विशिष्टता 96.9 फीसदी रही। वहीं, एलजीई में सामान्य दिखने वाले सात मरीजों में टी-1 मैपिंग ने हृदय के 112 हिस्सों में से 38 में असामान्यता के संकेत दिए। इन सभी मरीजों में कम से कम एक प्रभावित हिस्सा मिला। पीईटी जांच कराने वाले दोनों मरीजों में हृदय की सक्रिय सूजन की पुष्टि हुई।
एमआरआई से बीमारी की सक्रियता का आकलन
अध्ययन में एमआरआई और पीईटी-सीटी दोनों जांच कराने वाले दस मरीजों में एमआरआई ने पांच और पीईटी ने आठ मरीजों में सक्रिय बीमारी का पता लगाया। हालांकि, दोनों जांचों के परिणामों में अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, संदिग्ध कार्डियक सारकॉइडोसिस में टी-1, टी-2 मैपिंग और एलजीई का संयोजन हृदय की भागीदारी का पता लगाने में उपयोगी हो सकता है। अध्ययन टीम में डॉ. विनीता ओझा, डॉ. दिनकर भसीन, डॉ. विश्वजीत सिंह और डॉ. अरुण शर्मा सहित कई अन्य डॉक्टर शामिल थे।
कार्डियक सारकॉइडोसिस के लक्षण
डॉ. मल्ही के अनुसार, सारकॉइडोसिस सूजन संबंधी बीमारी है, जो शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। हृदय में इसका असर गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। शुरुआती चरण में कई मरीजों में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। बीमारी बढ़ने पर धड़कन अनियमित होना, हृदय की विद्युत गतिविधि में गड़बड़ी, पंपिंग क्षमता कम होना और हार्ट फेल्योर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ मामलों में अचानक हृदय संबंधी मृत्यु का जोखिम भी रहता है।