Zakir Hussain: तबला भले ही खामोश हो गया हो लेकिन धुनें करती रहेंगी दिलों पर राज, सबने नम आंखों से किया याद
उस्ताद जाकिर हुसैन का जाना कल्पना से परे हैं। वक्त-बेवक्त जाकिर हमदर्दी, प्यार और मोहब्बत के जरिये लोगों के दिलों में उतरते रहे। जो सम्मान उन्हें बतौर तबला वादक लोगों से मिलता था, अमूमन ऐसा किसी तबला वादक को नहीं मिलता।
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अंतिम सांस तक तबला ही रहा साथी
उस्ताद जाकिर हुसैन का जाना कल्पना से परे हैं। वक्त-बेवक्त जाकिर हमदर्दी, प्यार और मोहब्बत के जरिये लोगों के दिलों में उतरते रहे। जो सम्मान उन्हें बतौर तबला वादक लोगों से मिलता था, अमूमन ऐसा किसी तबला वादक को नहीं मिलता। अंतिम सांस तक तबला ही उनका साथी रहा। वह अपने घर में दिन-भर रियाज करते दिखाई देते थे। वह खुद को तबले का विद्यार्थी बताते थे। जाकिर भाई के साथ बहुत यादें जुड़ी हुई हैं। जाकिर भाई से गहरे ताल्लुकात करीब 46 साल पहले बने। 2019 में नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए), मुंबई में मैंने अजीज उस्ताद के साथ मंच साझा किया था। उनके जाने की खबर से बेहद दुखी हूं। इसे शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं है। हां, इतना जरूर कह सकता हूं कि उस्ताद का तबला भले ही खामोश हो गया है, लेकिन उनकी धुनें हमेशा गूंजती रहेंगी। -उस्ताद मोहम्मद अकरम खान, अजरदा घराने के मशहूर तबला वादक
वहां भी तबला पहुंचा दिया, जहां कोई गया नहीं था
साल 2011 की बात है। मुझे भारत सरकार की ओर से अल्जीरिया में तबला कंसर्ट के लिए भेजा गया था। जैसे ही एयरपोर्ट पहुंचा, एक अफसर मुझसे बाेले, यह तबला है न। मेरी हामी भरने के बाद वह बाेले, वही उस्ताद जाकिर हुसैन वाला न। उस्ताद जाकिर ने पूरी दुनिया को तबले से रूबरू करवाया है। मुझे निजी तौर पर लगता है कि मुझ जैसे तबला वादकों को हर जगह जो सम्मान मिलता है, उसकी नींव उस्ताद जाकिर हुसैन ने ही रखी है। इसलिए उनके जैसा कोई दूसरा तबला वादक कभी दुबारा जन्म नहीं लेगा। साथी तबला वादकों के साथ गर्मजोशी से पेश आते थे। मुलाकात होने पर वह खुद ही चाय परोसते थे। -देबाशीष अधिकारी, तबलावादक
श्रोताओं से शालीनता से पेश आते थे अंकल जाकिर
बनारस के तबला वादक रजनीश मिश्रा ने बताया कि करीब 10-12 साल पहले जाकिर हुसैन दिल्ली के सीरी फोर्ट में कंसर्ट करने आए थे। संजोग से उनकी मुलाकात जामा मस्जिद के एक प्रसिद्ध रेस्तरां में हुई। रजनीश ने उनसे कहा कि वह पंडित किशन महाराज के शिष्य हैं। इस पर जाकिर ने शालीनता से जवाब दिया कि वह तो मेरे भी गुरु हैं (असल में नहीं थे)।
उस्ताद की शख्सियत के हर आयाम पर हमें नाज है
मेरे पिताजी से उस्ताद जाकिर के गहरे ताल्लुकात थे। दिल्ली में होने पर दोनों की अक्सर मुलाकातें होती थीं। घर भी उनका आना होता था। मुझे वह अपने बच्चे की तरह से प्यार करते थे। उनके जाने का अफसोस तो है, लेकिन अपने संगीत के जरिए वह हमेशा याद रहेंगे। -पंडित अभय रुस्तुम सोपोरी, संतूर वादक व संगीतकार