{"_id":"6ab8f8f5a44bfe977f00b7ef","slug":"the-natural-water-path-from-the-aravallis-to-the-yamuna-has-been-severed-delhi-ncr-news-c-340-1-del1011-156742-2026-09-27","type":"story","status":"publish","title_hn":"Delhi NCR News: अरावली से यमुना तक टूट गया पानी का प्राकृतिक रास्ता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Delhi NCR News: अरावली से यमुना तक टूट गया पानी का प्राकृतिक रास्ता
विज्ञापन
विश्व नदी दिवस विशेष
दिल्ली की खोई जलधाराएं
अरावली से यमुना तक फैला था प्राकृतिक जलधाराओं का जाल, राजधानी बनने के बाद शहरीकरण ने छीने पानी के रास्ते
-कभी उफनने वाली धाराएं आज कहीं गंदे नाले, कहीं सड़कों और कंक्रीट के नीचे दबीं
संतोष कुमार
नई दिल्ली। कभी अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाला बारिश का पानी छोटी नदियों, तालाबों और झीलों से होता हुआ यमुना तक पहुंचता था। शहरीकरण, अतिक्रमण और प्रदूषण ने इस प्राकृतिक जलतंत्र को कमजोर कर दिया। नतीजा यह है कि आज बारिश में दिल्ली जलभराव से जूझती है, जबकि यमुना तक पहुंचने वाला पानी सीवेज से दूषित होता है।
1883-84 और 1912 के दिल्ली गजेटियर में बारापूला, तेहखंड और भूरिया नदी जैसी प्राकृतिक जलधाराओं का उल्लेख मिलता है। अरावली से निकलने वाला बारिश का पानी इन धाराओं से होकर यमुना तक पहुंचता था। फरीदाबाद क्षेत्र में परसौन समेत नौ अन्य जलधाराओं का भी जिक्र है, जिनमें कई का उद्गम बड़खल की पहाड़ियों से होता था। 1807 के एक ब्रिटिश हस्तनिर्मित नक्शे में भी इस प्राकृतिक जलतंत्र के संकेत मिलते हैं।
1912 के गजेटियर के मुताबिक, मानसून में बारापूला और भूरिया नदी का प्रवाह इतना तेज होता था कि मथुरा रोड से गुजरना मुश्किल हो जाता था। इतिहासकार और विरासत संरक्षणवादी सोहेल हाशमी बताते हैं कि सतपुला, अठपुला और बारापूला जैसे पुल इन जलधाराओं के महत्व के प्रमाण हैं। इन नदियों में साल भर पानी बहता था, हालांकि गर्मियों में इसका प्रवाह कम हो जाता था।
विज्ञापन
राजधानी बनने के बाद बढ़ा जलतंत्र पर दबाव
1911 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद शहर का विस्तार तेज हुआ। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 1901 से 2011 के बीच दिल्ली की आबादी करीब 41 गुना बढ़ी। विभाजन के बाद 1947 में लगभग छह लाख की आबादी अगले साल बढ़कर करीब 14 लाख हो गई। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की बस्तियां बड़ी संख्या में नालों के किनारे बसीं और उनसे निकलने वाला गंदा पानी प्राकृतिक जलधाराओं में पहुंचने लगा।
-आईसीएमआर की रिपोर्ट में 1947-1950 के बीच नजफगढ़ नाले पर सीवेज के बढ़ते दबाव का उल्लेख है। हाशमी के मुताबिक, आजादी के बाद प्राकृतिक जलधाराएं धीरे-धीरे सीवर ढोने लगीं। दूसरी ओर, अरावली की स्थानीय वनस्पति की जगह विलायती कीकर का विस्तार, खनन, सड़क निर्माण, कैचमेंट में बदलाव और वेटलैंड का नुकसान भी जलतंत्र के क्षरण की वजह बने।
-दिल्ली सरकार के हालिया अध्ययन में यमुना में गंदा पानी पहुंचाने वाली 24 ड्रेन का उल्लेख है, जिनमें 19 सीवेज ड्रेन हैं। यानी कभी बारिश का पानी नदी तक पहुंचाने वाली व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब प्रदूषित पानी ढो रहा है।
यमुना से टूटा कैचमेंट का रिश्ता
प्राकृतिक जलधाराओं के खत्म होने का असर जलभराव के साथ यमुना पर भी पड़ा है। पहले बारिश का पानी जमीन में समाता, तालाबों और वेटलैंड को भरता और फिर नदी तक पहुंचता था। अब कई जगह यह सड़कों पर बहता है या नालों के जरिये सीवेज के साथ यमुना में पहुंचता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. राधेश्याम शर्मा के मुताबिक, यमुना की सफाई के लिए मुख्य नदी के साथ उसके फ्लडप्लेन, छोटी सहायक जलधाराओं, वेटलैंड, जंगल और आसपास की खेती को भी संरक्षित करना जरूरी है।
साहिबी नदी से नजफगढ़ नाले तक की कहानी
साहिबी कभी यमुना की प्रमुख सहायक नदी थी। यह राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकलकर गुरुग्राम और नजफगढ़ झील से होते हुए वजीराबाद में यमुना से मिलती थी। भारतीय संग्रहालय में मौजूद 1807 के दिल्ली के नक्शे में साहिबी नदी दिखाई देती है। बाद में आए भूकंप से इसके यमुना से जुड़ाव के टूटने का उल्लेख मिलता है। इसका पानी नजफगढ़ झील में जमा होने लगा। झील का कैचमेंट क्षेत्र तब करीब 120 वर्ग किलोमीटर था। 1912 के गजेटियर में जलस्तर बढ़ने और नमी के कारण बुखार समेत जलजनित बीमारियों का जिक्र है। 1888 में सर हेनरी डेविड की अगुवाई में झील के पानी की निकासी के लिए नजफगढ़ ड्रेन बनाई गई।
जंगल-नदी नहीं, जिंदगी नहीं
मैं मानता हूं कि हर नदी का मूल जंगल है। दिल्ली में बहने वाली यमुना की सहायक नदियां भी अरावली के घास के मैदानों और झाड़ियों से निकलती थीं। इनकी जगह विलायती कीकर ने ले ली। दिल्ली में लैंडयूज और लैंडकवर तेजी से बदला है। छोटी नदियों के बाढ़ क्षेत्र में लोग बसते रहे। इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि छोटी नदियां अपने रास्ते भूलती चली गईं।
-डॉ. फैयाज खुदसर, पर्यावरणविद्
विज्ञापन
दिल्ली की खोई जलधाराएं
अरावली से यमुना तक फैला था प्राकृतिक जलधाराओं का जाल, राजधानी बनने के बाद शहरीकरण ने छीने पानी के रास्ते
-कभी उफनने वाली धाराएं आज कहीं गंदे नाले, कहीं सड़कों और कंक्रीट के नीचे दबीं
संतोष कुमार
नई दिल्ली। कभी अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाला बारिश का पानी छोटी नदियों, तालाबों और झीलों से होता हुआ यमुना तक पहुंचता था। शहरीकरण, अतिक्रमण और प्रदूषण ने इस प्राकृतिक जलतंत्र को कमजोर कर दिया। नतीजा यह है कि आज बारिश में दिल्ली जलभराव से जूझती है, जबकि यमुना तक पहुंचने वाला पानी सीवेज से दूषित होता है।
1883-84 और 1912 के दिल्ली गजेटियर में बारापूला, तेहखंड और भूरिया नदी जैसी प्राकृतिक जलधाराओं का उल्लेख मिलता है। अरावली से निकलने वाला बारिश का पानी इन धाराओं से होकर यमुना तक पहुंचता था। फरीदाबाद क्षेत्र में परसौन समेत नौ अन्य जलधाराओं का भी जिक्र है, जिनमें कई का उद्गम बड़खल की पहाड़ियों से होता था। 1807 के एक ब्रिटिश हस्तनिर्मित नक्शे में भी इस प्राकृतिक जलतंत्र के संकेत मिलते हैं।
विज्ञापन
1912 के गजेटियर के मुताबिक, मानसून में बारापूला और भूरिया नदी का प्रवाह इतना तेज होता था कि मथुरा रोड से गुजरना मुश्किल हो जाता था। इतिहासकार और विरासत संरक्षणवादी सोहेल हाशमी बताते हैं कि सतपुला, अठपुला और बारापूला जैसे पुल इन जलधाराओं के महत्व के प्रमाण हैं। इन नदियों में साल भर पानी बहता था, हालांकि गर्मियों में इसका प्रवाह कम हो जाता था।
विज्ञापन
राजधानी बनने के बाद बढ़ा जलतंत्र पर दबाव
1911 में दिल्ली के राजधानी बनने के बाद शहर का विस्तार तेज हुआ। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 1901 से 2011 के बीच दिल्ली की आबादी करीब 41 गुना बढ़ी। विभाजन के बाद 1947 में लगभग छह लाख की आबादी अगले साल बढ़कर करीब 14 लाख हो गई। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की बस्तियां बड़ी संख्या में नालों के किनारे बसीं और उनसे निकलने वाला गंदा पानी प्राकृतिक जलधाराओं में पहुंचने लगा।
-आईसीएमआर की रिपोर्ट में 1947-1950 के बीच नजफगढ़ नाले पर सीवेज के बढ़ते दबाव का उल्लेख है। हाशमी के मुताबिक, आजादी के बाद प्राकृतिक जलधाराएं धीरे-धीरे सीवर ढोने लगीं। दूसरी ओर, अरावली की स्थानीय वनस्पति की जगह विलायती कीकर का विस्तार, खनन, सड़क निर्माण, कैचमेंट में बदलाव और वेटलैंड का नुकसान भी जलतंत्र के क्षरण की वजह बने।
-दिल्ली सरकार के हालिया अध्ययन में यमुना में गंदा पानी पहुंचाने वाली 24 ड्रेन का उल्लेख है, जिनमें 19 सीवेज ड्रेन हैं। यानी कभी बारिश का पानी नदी तक पहुंचाने वाली व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब प्रदूषित पानी ढो रहा है।
यमुना से टूटा कैचमेंट का रिश्ता
प्राकृतिक जलधाराओं के खत्म होने का असर जलभराव के साथ यमुना पर भी पड़ा है। पहले बारिश का पानी जमीन में समाता, तालाबों और वेटलैंड को भरता और फिर नदी तक पहुंचता था। अब कई जगह यह सड़कों पर बहता है या नालों के जरिये सीवेज के साथ यमुना में पहुंचता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. राधेश्याम शर्मा के मुताबिक, यमुना की सफाई के लिए मुख्य नदी के साथ उसके फ्लडप्लेन, छोटी सहायक जलधाराओं, वेटलैंड, जंगल और आसपास की खेती को भी संरक्षित करना जरूरी है।
साहिबी नदी से नजफगढ़ नाले तक की कहानी
साहिबी कभी यमुना की प्रमुख सहायक नदी थी। यह राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकलकर गुरुग्राम और नजफगढ़ झील से होते हुए वजीराबाद में यमुना से मिलती थी। भारतीय संग्रहालय में मौजूद 1807 के दिल्ली के नक्शे में साहिबी नदी दिखाई देती है। बाद में आए भूकंप से इसके यमुना से जुड़ाव के टूटने का उल्लेख मिलता है। इसका पानी नजफगढ़ झील में जमा होने लगा। झील का कैचमेंट क्षेत्र तब करीब 120 वर्ग किलोमीटर था। 1912 के गजेटियर में जलस्तर बढ़ने और नमी के कारण बुखार समेत जलजनित बीमारियों का जिक्र है। 1888 में सर हेनरी डेविड की अगुवाई में झील के पानी की निकासी के लिए नजफगढ़ ड्रेन बनाई गई।
जंगल-नदी नहीं, जिंदगी नहीं
मैं मानता हूं कि हर नदी का मूल जंगल है। दिल्ली में बहने वाली यमुना की सहायक नदियां भी अरावली के घास के मैदानों और झाड़ियों से निकलती थीं। इनकी जगह विलायती कीकर ने ले ली। दिल्ली में लैंडयूज और लैंडकवर तेजी से बदला है। छोटी नदियों के बाढ़ क्षेत्र में लोग बसते रहे। इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि छोटी नदियां अपने रास्ते भूलती चली गईं।
-डॉ. फैयाज खुदसर, पर्यावरणविद्