ये हाईराइज बिल्डिंग दे रही हैं तबाही को न्यौता
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साइबर सिटी की हाईराइज शीशे वाली बिल्डिंगें भूकंप जैसी तबाही को लगातार निमंत्रित कर रही हैं। यहां भवनों के निर्माण में भूकंप निरोधक नियमों की लगातार अनदेखी हो रही है। इसका परिणाम काफी घातक हो सकता है।
आए दिन यहां शीशे वाली नई-नई ऊंची-ऊंची बिल्डिंग खड़ी हो रही हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सिसमिक जोन-4 में होने से गुड़गांव में रिएक्टर स्केल पर 05 या इससे अधिक तीव्रता वाला भूकंप काफी विनाशकारी हो सकता है।
ऊपर वाले की मेहरबानी कि अभी तक आए भूकंप की तीव्रता 4.6 तक ही रही है। गुड़गांव की ऊंची इमारतों में शीशे लगाने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है।
भूकंप के झटकों को सह पाएंगी या नहीं
इसमें यह नहीं देखा जा रहा है कि यह शीशे अच्छी गुणवत्ता वाले हैं कि नहीं। यह भूकंप के झटकों को सह पाएंगे कि नहीं। इसे लेकर विशेषज्ञ लोगों को लगातार आगाह कर रहे हैं।
मगर इसका कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। भूगर्भ विज्ञानी डॉ. अशोक दिवाकर का कहना है कि हाईराइजिंग बिल्डिंगों में टफ एंड ग्लास के शीशे लगे हों तो ठीक हैं।
अन्यथा वह भूकंप के झटकों को नहीं सह पाएंगे। इनके टूटने से जान-माल को भारी नुकसान पहुंच सकता है। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के पूर्व सीनियर स्पेशलिस्ट मेजर जनरल राज कौशल का कहना है कि पूरे दिल्ली-एसीआर में शीशे वाली बिल्डिंग का चलन बढ़ रहा है।
दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र बन सकता है भूकंप केंद्र...
यह भयानक प्रथा है। एक तो ऊंची-ऊंची रिहायशी और कॉरपोरेट बिल्डिंगों में भूकंप रोधी तकनीक का प्रयोग नहीं होता ऊपर से इसमें शीशे का प्रयोग वाकई में स्थिति को खराब करने वाली है। कौशल बताते हैं कि माइक्रोजोनेशन में पाया गया है कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र फाल्ट से सटा हुआ है। गुड़गांव तो सोहना फाल्ट का हिस्सा है।
अभी दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में आया भूकंप नेपाल का साइट इफेक्ट है। भूकंप विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में भूकंप का एपि सेंटर (परिकेंद्र) होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
क्योंकि यहां से गुड़गांव का सोहना फॉल्ट दिल्ली के यमुना क्षेत्र तक विस्तृत है। वहीं सहारनपुर-हरिद्वार फॉल्ट की जद में भी यह क्षेत्र आता है। भूकंप विशेषज्ञ राज कौशल का कहना है कि अगर एनसीआर में भूकंप का परिकेंद्र बना तो विनाश का अनुमान लगाना जा सकता है कि क्या होगा।
गिरता भूजल खतरे की घंटी...
विकास के नाम पर अरावली पहाड़ियों का खनन खतरे की घंटी है। जियो लॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भूंकप के पीछे गिरता भू-जल स्तर बहुत बड़े कारण के तौर पर देखा जा सकता है।
लगातार बहुमंजिली इमारतों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। इसमें भी भूजल का काफी प्रयोग किया जाता है। बेसमेंट और अंडरग्राउंड निर्माण कार्य से भी जमीन खोखली हो रही है।
गगनचंबी इमारतों में पार्किंग के लिए बेसमेंट भूकंप के दौरान पूरी इमारत की तबाही के कारण बन सकते हैं।
सोहना व अरावली पहाड़ी क्षेत्र संवेदनशील...
बड़े पैमाने पर भूजल दोहन व अरावली पहाड़ियों के जोड़ में आई दरारों के बाद भूकंप के मामले में सोहना व अरावली पहाड़ी से लगते क्षेत्र को संवेदनशील माना गया है।
इसके बाद ही गुड़गांव को सिसमिक जोन चार में शामिल किया गया है। हिपा के आपदा-प्रबंधन विभागाध्यक्ष डॉ. अभय श्रीवास्तव का कहना है कि अरावली क्षेत्र में दवाब के कारण जमीन की प्लेटें एक-दूसरे से टकराकर कंपन पैदा करती है।
भूजल के दोहन व पर्यावरण के नुकसान से अरावली की चट्टानों में ज्यादा भुराभुरापन है।