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Delhi NCR News: दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा, क्या आप जो चाहें कर सकते हैं?
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-एसआईआर ड्यूटी पर स्कूली शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
-केंद्रीय चुनाव आयोग को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर जवाब देने के लिए कहा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने आज चुनाव आयोग से स्कूल शिक्षकों को मतदाता सूची संशोधन के लिए विशेष गहन संशोधन कार्य पर तैनात करने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग मनमाने ढंग से ऐसे कर्तव्य सौंप सकता है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ वकीलों राजेश कुमार गोगना तथा अशोक अग्रवाल द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में चुनाव आयोग के इस कदम को चुनौती दी गई है, जिसमें स्कूल शिक्षकों को विशेष गहन संशोधन कार्य सौंपा गया है।
याचिका में कहा गया कि शिक्षकाें को कक्षाओं से हटाने से शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हो रही है। नियमित शिक्षकों की जगह अतिथि शिक्षक या अन्य विषयों के शिक्षक पढ़ा रहे हैं। यह बोझ मुख्यतः सरकारी, नगरपालिका तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों पर पड़ रहा है जहां गरीब तथा निम्न मध्यम वर्ग के छात्र पढ़ते हैं, जबकि निजी विद्यालय इससे अछूते रहे। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम की संबंधित धाराओं, सर्वोच्च न्यायालय के पिछले फैसलों तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 159 का हवाला देते हुए कहा कि गैर शिक्षण कर्मचारियों की बड़ी संख्या होने के बावजूद केवल शिक्षकों को चुना जाना उचित नहीं है। विशेष गहन संशोधन कार्य केवल छुट्टियों या गैर पाठ्य समय तक सीमित नहीं है। इसमें पूरे दिन की प्रशिक्षण, विद्यालय समय में घर-घर जाकर गणना तथा लंबे समय तक आंकड़ा प्रविष्टि व सत्यापन शामिल है जो कई सप्ताह तक विद्यालय कार्यों को बाधित करता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से कई प्रश्न किए। अदालत ने पूछा कि संविधान के अनुच्छेद तीन सौ चौबीस के तहत चुनाव आयोग को शिक्षकों को मनमाने ढंग से तैनात करने का अधिकार कहां से प्राप्त है। अदालत ने यह भी पूछा कि शिक्षकों को नियमित सरकारी कर्मचारियों की तरह छुट्टी क्यों नहीं दी जाती। अदालत ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग इसे स्वैच्छिक बता रहा है लेकिन शिक्षक इनकार नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि शिक्षकों को आराम की जरूरत है और क्या ये निर्देश आवश्यक कहे जा सकते हैं।
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चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील संजय वशिष्ठ ने कहा कि यह प्रक्रिया दिल्ली में लगभग पूरी हो चुकी है। तैनाती मुख्यतः छुट्टियों और गैर शिक्षण समय में की जा रही है। उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की संबंधित धारा का हवाला दिया और कहा कि यह पारदर्शी तरीके से किया जा रहा है। दिल्ली में इस कार्य के तहत मात्र दस से चौदह प्रतिशत स्कूल शिक्षकों की तैनाती की जा रही है। अदालत ने चुनाव आयोग को विस्तृत लिखित बयान दाखिल करने का निर्देश दिया है जिसमें इस कार्य की स्वैच्छिक प्रकृति पर स्पष्ट स्थिति बतानी होगी। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 को होगी। फिलहाल याचिका पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
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-केंद्रीय चुनाव आयोग को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर जवाब देने के लिए कहा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने आज चुनाव आयोग से स्कूल शिक्षकों को मतदाता सूची संशोधन के लिए विशेष गहन संशोधन कार्य पर तैनात करने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग मनमाने ढंग से ऐसे कर्तव्य सौंप सकता है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ वकीलों राजेश कुमार गोगना तथा अशोक अग्रवाल द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में चुनाव आयोग के इस कदम को चुनौती दी गई है, जिसमें स्कूल शिक्षकों को विशेष गहन संशोधन कार्य सौंपा गया है।
याचिका में कहा गया कि शिक्षकाें को कक्षाओं से हटाने से शिक्षा बुरी तरह प्रभावित हो रही है। नियमित शिक्षकों की जगह अतिथि शिक्षक या अन्य विषयों के शिक्षक पढ़ा रहे हैं। यह बोझ मुख्यतः सरकारी, नगरपालिका तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों पर पड़ रहा है जहां गरीब तथा निम्न मध्यम वर्ग के छात्र पढ़ते हैं, जबकि निजी विद्यालय इससे अछूते रहे। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम की संबंधित धाराओं, सर्वोच्च न्यायालय के पिछले फैसलों तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 159 का हवाला देते हुए कहा कि गैर शिक्षण कर्मचारियों की बड़ी संख्या होने के बावजूद केवल शिक्षकों को चुना जाना उचित नहीं है। विशेष गहन संशोधन कार्य केवल छुट्टियों या गैर पाठ्य समय तक सीमित नहीं है। इसमें पूरे दिन की प्रशिक्षण, विद्यालय समय में घर-घर जाकर गणना तथा लंबे समय तक आंकड़ा प्रविष्टि व सत्यापन शामिल है जो कई सप्ताह तक विद्यालय कार्यों को बाधित करता है।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से कई प्रश्न किए। अदालत ने पूछा कि संविधान के अनुच्छेद तीन सौ चौबीस के तहत चुनाव आयोग को शिक्षकों को मनमाने ढंग से तैनात करने का अधिकार कहां से प्राप्त है। अदालत ने यह भी पूछा कि शिक्षकों को नियमित सरकारी कर्मचारियों की तरह छुट्टी क्यों नहीं दी जाती। अदालत ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग इसे स्वैच्छिक बता रहा है लेकिन शिक्षक इनकार नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि शिक्षकों को आराम की जरूरत है और क्या ये निर्देश आवश्यक कहे जा सकते हैं।
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चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील संजय वशिष्ठ ने कहा कि यह प्रक्रिया दिल्ली में लगभग पूरी हो चुकी है। तैनाती मुख्यतः छुट्टियों और गैर शिक्षण समय में की जा रही है। उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की संबंधित धारा का हवाला दिया और कहा कि यह पारदर्शी तरीके से किया जा रहा है। दिल्ली में इस कार्य के तहत मात्र दस से चौदह प्रतिशत स्कूल शिक्षकों की तैनाती की जा रही है। अदालत ने चुनाव आयोग को विस्तृत लिखित बयान दाखिल करने का निर्देश दिया है जिसमें इस कार्य की स्वैच्छिक प्रकृति पर स्पष्ट स्थिति बतानी होगी। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 को होगी। फिलहाल याचिका पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।