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Delhi NCR News: चैपल सिंड्रोम से पीड़ित पांच साल के बच्चे का टारगेटेड थेरेपी से सफल इलाज
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अमेरिका से मंगानी पड़ी दवा, 10 दिन में दिखने लगा असर, अब एल्ब्यूमिन और इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की जरूरत नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के पांच साल के बच्चे को आखिरकार उस दुर्लभ बीमारी से राहत मिल गई, जिसने करीब तीन साल से उसका जीवन मुश्किल बना रखा था। बच्चा बार-बार दस्त, शरीर में सूजन, कमजोरी और विकास रुकने जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। कई जगह इलाज कराने के बावजूद उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में जेनेटिक जांच के बाद डॉक्टरों ने बीमारी की सही पहचान चैपल सिंड्रोम के रूप में की।
चैपल सिंड्रोम इम्यून सिस्टम से जुड़ी बेहद दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है। दुनिया में इसके करीब 100 मामले ही सामने आए हैं। इसमें शरीर से बड़ी मात्रा में प्रोटीन बाहर निकल जाता है, जिससे सूजन, बार-बार संक्रमण और कमजोरी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
डॉक्टरों ने जेनेटिक टेस्ट के आधार पर बच्चे के लिए पॉजेलिमैब नामक दवा से टारगेटेड थेरेपी शुरू की। दवा भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं थी, इसलिए अस्पताल ने कंपनी की मदद से इसे अमेरिका से मानवीय आधार पर मंगवाया। थेरेपी शुरू होने के महज 10 दिन में बच्चे की हालत में उल्लेखनीय सुधार दिखा। सूजन कम हुई, सक्रियता बढ़ी और रक्त में प्रोटीन का स्तर सामान्य होने लगा। अब उसे हर दो सप्ताह में एल्ब्यूमिन और इम्युनोग्लोबुलिन के इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ रही है।
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अस्पताल के डॉक्टर रोहन ग्रोत्रा के मुताबिक, सही समय पर जेनेटिक जांच और बीमारी के अनुरूप दवा का चयन इस बच्चे के इलाज में निर्णायक साबित हुआ। फिलहाल बच्चे में दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखा है और उसकी नियमित निगरानी की जा रही है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के पांच साल के बच्चे को आखिरकार उस दुर्लभ बीमारी से राहत मिल गई, जिसने करीब तीन साल से उसका जीवन मुश्किल बना रखा था। बच्चा बार-बार दस्त, शरीर में सूजन, कमजोरी और विकास रुकने जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। कई जगह इलाज कराने के बावजूद उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में जेनेटिक जांच के बाद डॉक्टरों ने बीमारी की सही पहचान चैपल सिंड्रोम के रूप में की।
चैपल सिंड्रोम इम्यून सिस्टम से जुड़ी बेहद दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है। दुनिया में इसके करीब 100 मामले ही सामने आए हैं। इसमें शरीर से बड़ी मात्रा में प्रोटीन बाहर निकल जाता है, जिससे सूजन, बार-बार संक्रमण और कमजोरी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
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डॉक्टरों ने जेनेटिक टेस्ट के आधार पर बच्चे के लिए पॉजेलिमैब नामक दवा से टारगेटेड थेरेपी शुरू की। दवा भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं थी, इसलिए अस्पताल ने कंपनी की मदद से इसे अमेरिका से मानवीय आधार पर मंगवाया। थेरेपी शुरू होने के महज 10 दिन में बच्चे की हालत में उल्लेखनीय सुधार दिखा। सूजन कम हुई, सक्रियता बढ़ी और रक्त में प्रोटीन का स्तर सामान्य होने लगा। अब उसे हर दो सप्ताह में एल्ब्यूमिन और इम्युनोग्लोबुलिन के इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ रही है।
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अस्पताल के डॉक्टर रोहन ग्रोत्रा के मुताबिक, सही समय पर जेनेटिक जांच और बीमारी के अनुरूप दवा का चयन इस बच्चे के इलाज में निर्णायक साबित हुआ। फिलहाल बच्चे में दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखा है और उसकी नियमित निगरानी की जा रही है।