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बुढ़ापे में सेहतमंद रहने के लिए रीढ़ की हड्डी की देखभाल जरूरी : डॉ. भावुक गर्ग
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- इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बढ़ती उम्र में रीढ़ की हड्डी विषय पर हुई चर्चा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की समस्याओं और हड्डियों की कमजोरी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डायलॉग्स इन हेल्थ एंड वेलनेस श्रृंखला के तहत बढ़ती उम्र में रीढ़ की हड्डी: कैसे सीधे, सक्रिय और दर्द-मुक्त रहें विषय पर कार्यक्रम हुआ।
एम्स दिल्ली के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रो. डॉ. भावुक गर्ग ने कहा कि उम्र बढ़ना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, इसका अर्थ शारीरिक अक्षमता नहीं है। रीढ़ की सेहत बनाए रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, मांसपेशियों की मजबूती, संतुलन, हड्डियों का स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव बेहद अहम है। देश में ऑस्टियोपोरोसिस और उम्र से जुड़ी रीढ़ की बीमारियों के बढ़ते बोझ के कारण बड़ी संख्या में बुजुर्ग हड्डियों की कमजोरी और फ्रैजिलिटी फ्रैक्चर (कमजोरी के कारण हड्डी टूटना) से पीड़ित हैं। मगर, समय पर उनकी पहचान और उपचार नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि ऑस्टियोपोरोसिस को केवल बोन मिनरल डेंसिटी की कमी के रूप में नहीं बल्कि समग्र शारीरिक क्षमता और स्वस्थ उम्र बढ़ने के नजरिए से देखने की आवश्यकता है। शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का आकलन कर चलने की गति, हाथों की पकड़ की ताकत, एक पैर पर खड़े रहने की क्षमता, नींद की गुणवत्ता, भूख व पोषण, तनाव प्रबंधन और सामाजिक जुड़ाव शामिल हैं।
डॉ. भावुक गर्ग ने कहा कि इन संकेतों में गिरावट शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में कमी का शुरुआती संकेत हो सकती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अश्वनी कुमार ने किया। चर्चा में एम्स ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश मल्होत्रा, न्यूरोलॉजी विभाग में प्रोफेसर डॉ. अंचल के.श्रीवास्तव, एनेस्थिसियोलॉजी, पेन मेडिसिन और क्रिटिकल केयर के प्रोफेसर डॉ. पुनीत खन्ना शामिल रहे।
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नई दिल्ली। बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की समस्याओं और हड्डियों की कमजोरी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डायलॉग्स इन हेल्थ एंड वेलनेस श्रृंखला के तहत बढ़ती उम्र में रीढ़ की हड्डी: कैसे सीधे, सक्रिय और दर्द-मुक्त रहें विषय पर कार्यक्रम हुआ।
एम्स दिल्ली के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रो. डॉ. भावुक गर्ग ने कहा कि उम्र बढ़ना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, इसका अर्थ शारीरिक अक्षमता नहीं है। रीढ़ की सेहत बनाए रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, मांसपेशियों की मजबूती, संतुलन, हड्डियों का स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव बेहद अहम है। देश में ऑस्टियोपोरोसिस और उम्र से जुड़ी रीढ़ की बीमारियों के बढ़ते बोझ के कारण बड़ी संख्या में बुजुर्ग हड्डियों की कमजोरी और फ्रैजिलिटी फ्रैक्चर (कमजोरी के कारण हड्डी टूटना) से पीड़ित हैं। मगर, समय पर उनकी पहचान और उपचार नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि ऑस्टियोपोरोसिस को केवल बोन मिनरल डेंसिटी की कमी के रूप में नहीं बल्कि समग्र शारीरिक क्षमता और स्वस्थ उम्र बढ़ने के नजरिए से देखने की आवश्यकता है। शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का आकलन कर चलने की गति, हाथों की पकड़ की ताकत, एक पैर पर खड़े रहने की क्षमता, नींद की गुणवत्ता, भूख व पोषण, तनाव प्रबंधन और सामाजिक जुड़ाव शामिल हैं।
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डॉ. भावुक गर्ग ने कहा कि इन संकेतों में गिरावट शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में कमी का शुरुआती संकेत हो सकती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अश्वनी कुमार ने किया। चर्चा में एम्स ऑर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश मल्होत्रा, न्यूरोलॉजी विभाग में प्रोफेसर डॉ. अंचल के.श्रीवास्तव, एनेस्थिसियोलॉजी, पेन मेडिसिन और क्रिटिकल केयर के प्रोफेसर डॉ. पुनीत खन्ना शामिल रहे।
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