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पराली का असर:15 अक्तूबर के बाद ज्यादा खराब होंगे दिल्ली-एनसीआर में हालात

Mon, 14 Oct 2019 05:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 14 Oct 2019 05:45 AM IST
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Situation in Delhi-NCR will be worse after October 15 because of burning stubble 
दिल्ली वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने पर पूरी तरह शिकंजा नहीं कस पाने का असर इस बार भी वायु गुणवत्ता पर दिखने लगा है। राष्ट्रीय राजधानी में तो वायु प्रदूषण में बढ़ोत्तरी दर्ज की ही गई, लेकिन पंजाब और हरियाणा के शहर भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। 

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विशेषज्ञों का मानना है कि 15 अक्तूबर के बाद हालात और ज्यादा खराब होंगे, क्योंकि इस दौरान ही पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं। हालांकि पंजाब के अधिकारियों का कहना है कि पराली जलाने पर नियंत्रण किया जा रहा है और इसका कुल आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले कम रहेगा।
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पराली जलाने के कारण बिगड़ी आबोहवा का असर दिल्ली के साथ ही एनसीआर के अन्य जिलों में भी दिखाई दिया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, दिल्ली में जहां ओवरऑल वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) शनिवार के 222 से बढ़कर शाम 4.30 बजे तक 268 और रात 10 बजे 301 पर पहुंच गया, जिसे बहुत खराब की श्रेणी में माना जाता है। 
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वहीं शाम 4.30 बजे तक गाजियाबाद में 320, फरीदाबाद में 290, नोएडा में 310, ग्रेटर नोएडा में 312, बागपत 259 और मुरथल में एक्यूआई का स्तर 245 रहा। शाम के वक्त प्रदूषण में और भी बढ़ोतरी का असर दिखने लगा। दिल्ली में आनंद विहार में 327, वजीरपुर में 323, विवेक विहार में 317, मुंडका में 309, बवाना में 302 और जहांगीरपुरी में एक्यूआई 300 पर दर्ज किया गया।

 केंद्र सरकार के सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकॉस्टिंग एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी पिछले कुछ दिन में पराली जलने की घटनाओं में बढ़ोतरी होने और इससे दिल्ली की आबोहवा प्रभावित होने की रिपोर्ट दी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, हवा की दिशा में परिवर्तन और रफ्तार कम होने की वजह से प्रदूषक तत्वों का ज्यादा असर फिलहाल पड़ोसी राज्यों में ही ज्यादा दिखा है। इसका अंदाजा रविवार को शाम 4.30 बजे तक करनाल के अलीपुर खालसा में एक्यूआई 351 पर और पानीपत में 339 पर दर्ज किए जाने से लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का अंदाजा है कि पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं का असर अगले तीन-चार दिन में राष्ट्रीय राजधानी में भी दिखेगा तथा हवा और जहरीली हो जाएगी। केंद्र सरकार के सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर) का भी कहना है कि पराली जलाने की वजह से दिल्ली में 15 अक्तूबर तक करीब छह फीसदी तक प्रदूषण बढ़ सकता है, जबकि शनिवार को यह दो फीसदी था।

15 से दिल्ली में लागू हो जाएगा ग्रैप

दिल्ली व एनसीआर में वायु गुणवत्ता का स्तर बिगड़ने से बचाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) लागू करेगा। 2017 से की जा रही इस कवायद में सार्वजनिक बस व मेट्रो सेवाओं के फेरे बढ़ाए जाएंगे, निजी वाहनों का उपयोग रोकने के लिए पार्किंग शुल्क में भारी बढ़ोत्तरी होगी और डीजल जनरेटरों का उपयोग प्रतिबंधित रखा जाएगा।

इसके अलावा हालात ‘गंभीर’ स्तर पर पहुंचने पर ग्रैप के तहत ईंट भट्टे, स्टोन क्रशर व हॉट मिक्स प्लांट बंद कराए जाएंगे। पानी का छिड़काव व सड़कों की मशीनों से सफाई की जाएगी और बिजली बनाने के लिए कोयले की जगह नेचुरल गैस का इस्तेमाल होगा। बाहरी ट्रकों के दिल्ली में आगमन पर प्रतिबंध लगेगा और वाहनों के लिए सम-विषम योजना लागू की जाएगी।

नहीं दिख रहा पंजाब-हरियाणा में सब्सिडी देने का असर
पंजाब और हरियाणा की सरकारें पराली जलाने पर पाबंदी के साथ-साथ किसानों को जागरूक करने की भी कोशिश कर रही हैं। राज्य सरकारें पराली जलाने के वैकल्पिक उपायों को अपनाने के लिए उपकरणों की खरीद पर किसानों को 50-80 फीसदी तक सब्सिडी भी दे रही है। बावजूद इसके फसलों के अवशेष जलाने के मामलों में कमी नहीं आई है।

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के मुताबिक, 11 अक्तूबर तक पिछले साल की पराली जलाने की 435 घटनाओं के मुकाबले इस बार 630 घटनाएं दर्ज की गई हैं। अमृतसर में 295, तरनातरन में 126 व पटियाला में 57 घटनाएं पराली जलाने की रहीं। पंजाब के कृषि सचिव केएस पन्नू ने हालांकि यह कहकर बचाव करने का प्रयास किया कि सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें सही हालात नहीं दिखा रही हैं।

उन्होंने कहा, केंद्र सरकार के डाटा के हिसाब से ही 1 से 10 अक्तूबर तक पंजाब में 2016 में 1714 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2019 में महज 430 घटनाएं इस दौरान दर्ज की गईं। पीपीसीबी के चेयरमैन एसएस मारवाह का दावा है कि पराली जलाने से रोकने के लिए 20-20 लोगों की 6000 टीम गठित की गई हैं, जो गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक कर रही हैं। इसके लिए कॉलेजों से राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के 1.20 लाख स्वयंसेवकों की मदद ली गई है।

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