आरटीआई: पार्टियों का ‘दोस्त’ भी ‘दुश्मन’ भी
एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने हाल ही में राज्यसभा में आरटीआई के दुरुपयोग का मामला उठाते हुए कहा था कि ‘चाय वाला’ और ‘पनवाड़ी’ भी मिसाइल सिस्टम के बारे में पूछता है।
पटेल का यह बयान इस बात का सबूत है कि आम आदमी सूचना के अधिकार का किस हद तक इस्तेमाल करता है, जबकि राजनीतिक दलों की कहानी अलग है। सत्ता से दूर रहते हुए तो उन्हें आरटीआई भाता है लेकिन कुर्सी पर बैठते ही यह कानून ‘दर्द’ देने वाला लगने लगता है।
सत्ताधारी दलों से शुरुआत करें तो भाजपा और आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आने के लिए तत्कालीन सरकारों के खिलाफ आरटीआई का जमकर इस्तेमाल किया लेकिन अब इनकी आरटीआई सेल या तो भंग हो गई या फिर सुस्त पड़ गई है।
भाजपा ने संप्रग दो के कार्यकाल में आरटीआई सेल बनाई थी। इसकी कमान संभालने वाले एडवोकेट विवेक गर्ग का दावा है कि उन्होंने 2जी घोटाला, ट्रांसपोर्ट घोटाला जैसे मामले उजागर किए।
सत्ता में आते ही भाजपा और आप की आरटीआई सेल पड़ी सुस्त
अब वह व्यक्तिगत स्तर पर अन्य दलों के खिलाफ आरटीआई लगाते हैं क्योंकि सूत्रों की मानें तो अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनते ही पार्टी की आरटीआई सेल बंद कर दी गई।
वहीं कांग्रेस अब आरटीआई से ही अपनी खोई जमीन तलाशने में जुटी है। आरटीआई एक्टिविस्ट और महाराष्ट्र कांग्रेस कमेटी के सचिव शहजाद पूनावाला बताया कि जब कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथ में आएगी तब पार्टी भी आरटीआई सेल बना सकती है।
आप नेता अरविंद केजरीवाल ने आरटीआई का इस्तेमाल केन्द्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ किया था। दिल्ली में सरकार बनने के बाद आरटीआई सेल की ओर से खुलासा नहीं हुआ है। आप के विधायक सौरभ भारद्वाज का कहना है कि पार्टी ने कई आरटीआई लगाई हैं लेकिन केंद्रीय सूचना आयोग सही ढंग से जवाब नहीं देता।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के राष्ट्रीय समन्वयक रिटा. मेजर जनरल अनिल वर्मा के मुताबिक राजनीतिक दल खुद को आरटीआई के दायरे में लाने का विरोध करते हैं और इस मुद्दे पर एकजुट हो जाते हैं। जबकि यही दल सत्ताधारी दलों के खिलाफ आरटीआई का बेजा इस्तेमाल करते हैं।