'84 के बाद पहली बार दिखा इतना तनाव'
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दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाक़े में शुक्रवार को दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़पों के बाद अब स्थिति तेज़ी के साथ सामान्य हो रही है, ऐसा पुलिस का दावा है। पूरे इलाके में निषेधाज्ञा लागू है और अब तक 70 से ज़्यादा लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
ख़बरें हैं कि झड़पों में 13 पुलिसकर्मियों के अलावा 14 और लोग घायल हुए हैं। 1984 के बाद यह पहला मौक़ा है जब इस इलाक़े में ऐसा तनाव देखा गया।
सड़क पर बिखरी शराब की बोतलों का कांच।। और बिखरे कांच और ईंट-पत्थरों के मलबे पर आती-जाती पुलिस की गाड़ियां। हमेशा गहमागहमी से भरे इस इलाक़े में अब सन्नाटा पसरा है। सड़कें वीरान हैं और जगह-जगह पर पुलिस है।
कैसे हुई इस घटना की शुरूआत?
घटना की शुरुआत कैसे हुई इस पर अलग-अलग दावे हैं। ब्लॉकों में बंटी त्रिलोकपुरी की बस्तियों में छोटी-मोटी झड़पें तो आम बात है। मगर इन झड़पों ने इतना बड़ा रूप कभी नहीं लिया था।
हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि फसाद की जड़ शराब ही थी जिसने एक छोटे से मामले को हवा दी और देखते-देखते इलाक़े में तनाव फैल गया। त्रिलोकपुरी के लोगों ने 1984 के बाद कभी दंगा नहीं देखा है।
1984 के दंगों में यहां कई लोग मारे गए थे। 30 साल के वक़्फ़े के बाद माहौल खराब होने को लोग षड्यंत्र मान रहे हैं। इलाक़े के बुज़ुर्ग कहते हैं, ''मैं यहां 1976 से रह रहा हूं। 1984 में हमने एक भीषण दंगा देखा था जिसमें बहुत सारी जानें गईं थीं। पूरी दिल्ली में यही इलाक़ा था, जो सबसे ज़्यादा प्रभावित था। 30 साल बाद माहौल को एक बार फिर ख़राब करने की कोशिश की जा रही है।''
असामाजिक तत्व और मुसीबत
धड़ल्ले से चल रहे शराब और जुए के धंधे की वजह से यहां असामाजिक तत्वों का अघोषित राज है। उन्हें दुःख है कि इन तत्वों को राजनीतिक संरक्षण भी मिला हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कई दिनों से तनाव झेल रहे लोगों को अब सुकून की तलाश है।
उनका कहना है कि पुलिस गिरफ्तार किए गए लोगों को उनके परिजनों से नहीं मिलने दे रही है। इलाक़े के सामाजिक कार्यकर्ता अमर कहते हैं, "कई घायल ऐसे भी हैं जो पिछले दो दिन से पुलिस हिरासत में हैं। उन्हें चिकित्सा मुहैय्या नहीं कराई जा रही है। इलाक़े में रहने वाले सभी लोग शांति चाहते हैं। सब परेशान हैं।"
निषेधाज्ञा लागू होने से लोग अपने घरों में सिमटे हैं। त्रिलोकपुरी की शांति समिति के लोग घर-घर जाकर लोगों में भाईचारा बनाए रखने की कोशिश में लगे हैं।
पत्थरबाजी और आगज़नी के बाद इलाक़े में रह रहे सभी लोग परेशान हैं चाहे वो आमना हो या सविता। आमना के यहां ज़रदोज़ी का काम होता है और उनका कहना है कि हिंसा के बाद उन्होंने अपने बेटों को घर के अंदर बंद कर दिया था।
"मगर पुलिस ने हमारे घर का ताला तोड़ा और मेरे तीन बेटों को पकड़कर ले गई। दो दिन से मैं थाने आ रही हूं। मगर मुझे मिलने नहीं दिया जा रहा है।" सविता का भी कहना है कि वो पिछले शुक्रवार से ही मयूर विहार थाने के चक्कर लगा रही हैं। मगर पुलिसवाले उन्हें अपने बेटे से नहीं मिलने दे रहे हैं।