फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Providing online education in epidemic is the responsibility of private schools

हाईकोर्ट ने कहा, महामारी में ऑनलाइन शिक्षा देना निजी स्कूलों की जिम्मेदारी

Sat, 19 Sep 2020 04:59 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली    
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली     Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 19 Sep 2020 04:59 AM IST
विज्ञापन
Providing online education in epidemic is the responsibility of private schools
delhi high court

ऑनलाइन शिक्षा आरटीई एक्ट के दायरे में आती है, इसलिए महामारी में निजी स्कूल अपनी जिम्मेदारी के तौर पर यह प्रदान कर रहे हैं, यह स्वैच्छिक या समाज सेवा नहीं है। 

विज्ञापन


हाईकोर्ट ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने के आधार पर स्कूल बंद होने के बाद भी निजी स्कूल फीस वसूल रहे हैं। फीस का भुगतान शिक्षा के लिए किया जाता है, सीट पर अधिकार के लिए नहीं। 
विज्ञापन


हालांकि निजी स्कूलों ने तर्क रखा था कि संसद ने आरटीई कानून बनाते समय कोरोना महामारी तथा तकनीकी विकास को ध्यान में नहीं रखा होगा। इसलिए कोर्ट इस कानून को मौजूदा हालात में लागू नहीं कर सकती। यह कानून पड़ोस के स्कूल द्वारा कक्षा में शिक्षा प्रदान करने की बात करता है न कि ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की। 
विज्ञापन
विज्ञापन


स्कूलों की ओर से दावा किया गया था कि कई गैर सहायता प्राप्त स्कूल किसी कानूनी प्रावधान या बाध्यता से नहीं, बल्कि समाज सेवा के तौर पर ऑनलाइन शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।

अगर कोर्ट इसमें ऑनलाइन शिक्षा को भी शामिल करती है तो इससे गैरजरूरी तौर पर आरटीई कानून का विस्तार होगा जबकि कानून में नजदीकी स्कूल शब्द का इस्तेमाल किया गया है। कोर्ट अपनी व्याख्या से इसमें कोई ऐसा शब्द नहीं जोड़ सकती जिसका उल्लेख कानून में नहीं किया गया है। 

हालांकि कोर्ट ने इस पर कहा कि आरटीई कानून में शिक्षा को परिभाषित नहीं किया है क्योंकि इसे सामाजिक परिवर्तन, तकनीकी आधुनिकीकरण, महामारी फैलने तथा प्राकृतिक आपदा समेत कई विस्तृत परिस्थितियों से निपटने की जरूरत है जिनका अंदाजा पहले से नहीं लगाया जा सकता। इसलिए शिक्षा का शब्द जड़वत नहीं बल्कि जीवंत अवधारणा है। शिक्षा के प्रकार, उसके तौर-तरीकों में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। 

अगर वैश्विक शिक्षा की उच्च गुणवत्ता को हासिल करना है तो शिक्षा के तौर-तरीकों में बुनियादी परिवर्तन करना होगा। स्कूल कानून के दायरे में रहकर शिक्षा प्रदान करने का तरीका चुनने के लिए आजाद थे।
 

हाईकोर्ट ने किया सतर्क

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऑनलाइन शिक्षा पारंपरिक शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकता और प्रारंभिक शिक्षा के डिजीटलीकरण की गहराई से पड़ताल की आवश्यकता है क्योंकि इसमें बच्चे को बातचीत का माहौल नहीं मिलता। 

न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने अपनी अलग टिप्पणी में कहा कि शिक्षा में डिजीटल अथवा ऑनलाइन मोड को शामिल किया जा सकता है लेकिन यह स्थाई व्यवस्था न होकर केवल एक वैकल्पिक उपाय है।

महामारी के हालात में ऑनलाइन एजुकेशन की ओर जाने का फैसला रातोंरात हुआ और इस पर अधिक विचार नहीं हुआ। अप्रत्याशित हालात के कारण यह कदम उठाना पड़ा। इसलिए इसे अपनाने में स्कूलों की कोई गलती नहीं है। हालांकि यह ध्यान रखना होगा इसमें कई बातों का ध्यान रखने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति नरूला ने कहा कि आरटीई के नियम तथा मानक के तौर पर शिक्षा से आशय सुरक्षित भवन में शिक्षा देने से है। इसका मुख्य मकसद हर बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाने और अन्य बच्चों के साथ शिक्षा ग्रहण करने का अच्छा माहौल देने से है।

इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि डिजीटल शिक्षा पारंपरिक स्कूली शिक्षा का पर्याय नहीं है। इसलिए इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। सरकार को शिक्षा तथा तकनीकी विशेषज्ञों को साथ लेकर शिक्षा के बदलते स्वरूप का अध्ययन करना चाहिए। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed