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कुर्सी मिलने से पहले ही शुरू कर दिए घपले

Tue, 15 Apr 2014 11:24 AM IST
Updated Tue, 15 Apr 2014 11:24 AM IST
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political leaders denies their promise before they win elections

चुनावी घोषणा पत्रों में बड़े-बड़े वादे करने वाले नेताजी कुर्सी मिलने से पहले ही बदल गए। चुनाव प्रचार के दौरान ही नेताओं के इस रंग ने आम आदमी को खासा निराश किया है।

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उम्मीदवारों की जीत के लिए दिन-रात एक करने वाले लोग अब खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। क्योंकि नेताओं ने उनके साथ जैसा व्यवहार किया है उससे तो यह साफ है कि चुनाव जीतने के बाद उनसे किसी तरह की उम्मीद रखना ही बेकार है।
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कुछ ऐसे ही लोगों की दास्तां बता रही है अमर उजाला संवाददाता प्रिया गौतम की रिपोर्ट...

न रोटी न पानी, पैसे भी मार लिए

political leaders denies their promise before they win elections

दिल्ली के एक इलाके में रिक्शा चालकों के मुखिया महमूद सागर ने बताया कि मतदान वाले दिन उनके यहां से कमरे आलम और रोज मोहम्मद का बैटरी रिक्शा बुक किया गया।

इस दौरान एक-एक हजार रुपये देने और खाना-पीना देने की बात तय हुई। शाम तक जमकर काम लिया और खाना भी नहीं दिया गया। पैसा भी चुनाव पूरा होने के चार दिन बाद सोमवार को दिया गया और वह भी दोनों के 1800 रुपये।

वहीं ट्राई साइकिल से प्रचार करने वाले श्याम बिहारी ने कहा कि जब उन्हें शुरुआत में चुनाव प्रचार के लिए रखा गया तो साढे़ चार सौ रुपये देने का वादा किया गया था। खाना-पीना भी हमें इसी में से खाना था और सुबह से शाम तक घूमना था। 15 दिन तो साढ़े चार सौ दिए। उसके बाद एकदम से 370 रुपये देने लगे।

चुनाव के बाद भी मत रखना उम्मीद

political leaders denies their promise before they win elections

एक अन्य विकलांग धनंजय शर्मा ने कहा कि उन्हें एक उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं ने प्रचार के लिए रखा था। साढे़ चार सौ का वादा किया, लेकिन मिले कुल साढ़े तीन सौ रुपये।

जबकि कुछ लोगों को तो तीन सौ सत्तर दिए गए। उन्होंने कहा कि उनके और भी साथियों को साढे़ तीन सौ रुपये ही दिए गए।

दिल्ली की सड़कों पर दिनभर धूप में घूम-घूम कर प्रचार करने वाले इन विकलांगों को मेहनत का पूरा पैसा न देकर नेताओं ने यह साबित कर दिया चुनाव जीतने के बाद भी जनता उनसे कोई उम्मीद न रखे।

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'नहीं करना तो छोड़ दो काम'

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विकलांग चरन दास कहते हैं कि प्रचार से पहले एक महीने के लिए साढे़ तेरह हजार रुपये देने की बात तय हुई थी। इस बात पर भरोसा करके उन्होंने और उनके साथियों ने अपनी-अपनी गाड़ियों को सजाया और प्रचार में जुट गए।

लेकिन जब पैसे देने की बारी आई तो उन्हें सिर्फ 11 हजार रुपए ही दिए गए। उन्होंने जब इतने पैसे लेने से मना किया तो नेताजी के लोगों ने दो टूक में जवाब दिया कि नहीं करना तो छोड़ दो।

ऐसे ही राजू यादव ने अपने 20 साथियों के साथ सुबह से शाम तक दिल्ली की सड़कों पर प्रचार किया लेकिन पेमेंट के वक्त पूरा पैसा नहीं दिया गया। जब उन्होंने इसकी शिकायत की तो कार्यकर्ताओं ने कहा कि बाद में हिसाब कर लेना।

'प्रचार करो, पैसे ले लेना'

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यमुना पार के रहने वाले समीर ने बताया कि एक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रिक्शे के पीछे बैनर चिपका दिया था। उन्होंने ऐसा करने से मना किया तो कार्यकर्ताओं ने कहा कि पैसे ले लेना।

इतना ही नहीं वो लोग समीर का मेरा फोन नंबर भी ले गए। कुछ दिन बाद फोन किया कि अपने तीन दिन के डेढ़ सौ रुपये ले जाओ और काम पर आओ। लेकिन समीर ने इतने कम पैसे लेने से मना कर दिया। उनका तर्क है कि इससे ज्यादा तो वैसे ही कमा लेते हैं।

विकलांग परमेश्वर यादव ने बताया कि उनसे कहा गया था कि पैसे देंगे, प्रचार करो। लेकिन जब उन्होंने एडवांस मांगा तो नेताजी ने कुछ नहीं दिया।

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