प्लीज! लोटस टेंपल के लिए प्रार्थना करिए
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राजधानी की आबोहवा में इतना प्रदूषण घुल चुका है कि यहां इंसान तो छोड़िए राजधानी को विशेष पहचान दिलाने वाली इमारतें भी इससे अछूती नहीं हैं। प्रदूषण के चलते बहाई मंदिर जैसी धरोहर की उम्र भी तेजी से कम हो रही है जो चिंता का विषय है।
यह बात नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दाखिल की गई एक याचिका में कहा गया है। इस याचिका में नेहरू प्लेस स्थित बहाई मंदिर जिसे लोटस टेम्पल के नाम से जाना जाता है की प्रदूषण के कारण हो रही दुर्दशा के लिए चिंता जताई गई है।
याचिका के अनुसार क्षेत्र में फैले वायु प्रदूषण से लोटस टेम्पल का सफेद संगरमरमर पीला पड़ रहा है। इसके साथ ही ध्वनि प्रदूषण के कारण मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को पूजा करने में परेशानी होती है।
अवैध पार्किंग है बड़ी वजह
याचिकाकर्ता संजीव ऐलावादी जो खुद एक वकील हैं ने एनजीटी में शहर में फैल रहे प्रदूषण को लेकर याचिका डाली थी। 25 फरवरी को ट्रिब्यूनल ने संजीव की याचिका मंजूर कर ली थी।
इसी मंगलवार को उन्होंने कोर्ट के सामने एक प्रेजेंटेशन देकर दिल्ली में व्याप्त प्रदूषण के बारे में कोर्ट को बताया था। जिसके बाद एनजीटी ने 10 से पुराने डीजल वाहनों को सड़क पर चलने से मना कर दिया था।
याचिका पर सुनवाई करते हुए जज स्वतंत्र कुमार ने कहा कि देश में केवल एक ही बहाई मंदिर है। और मंदिर को बचाने के लिए नेहरू प्लेस में अवैध पार्किंग को रोकना ही होगा।
जब बहाई हाउस ऑफ वर्शिप के जनरल मैनेजर से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने प्रदूषण से मंदिर को रहे नुकसान पर सहमति जताई।
ग्रीस जैसा ही है लोटस टेंपल का हाल
मंदिर के जनरल मैनेजर शाहीन जावेद ने कहा कि उनके पास कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं है पर वह यहां 18 सालों से हैं और उन्होंने लगातार यहां प्रदूषण बढ़ते देखा है।
वो कहते हैं कि मंदिर को हर तीन महीने पर सादे पानी से धोया जाता है लेकिन उन्हें डर है कि इतना ही काफी नहीं होगा। जावेद कहते हैं कि मंदिर पेंटेलिकॉन नाम के मार्बल से बना है जो ग्रीस से इंपोर्ट किया गया है।
इसी मार्बल से ग्रीस में पार्थेनन नामक इमारत भी बनी है और आज वो भी ऐसी ही प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है।
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज के दिल्ली चैप्टर के संयोजक एजीके मेनन कहते हैं कि वह ऐसी ही समस्या ताज महल में भी देख चुके हैं।
गाड़ियों और उद्योगों से निकलने वाला सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड नमी से मिलकर एसिड बनते हैं जो मार्बल को खाने का काम करते है।
जिसका परिणाम होता है मार्बल में पीलापन और गड्ढे। मेनन कहते हैं कि इनकी केवल सुरक्षा की जा सकती है इन्हें पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता।
कहीं खो ना जाए पहचान
याचिकाकर्ता ऐलावादी कहते हैं कि नेहरू प्लेस दिल्ली का एक अधिकतम व्यस्त व्यापारिक क्षेत्र है। यहां हर रोज 1,30,000 से भी ज्यादा लोगों का आना जाना होता है।
हालांकि ये आवागमन नियोजित तरीके से नहीं होता इसलिए यहां ट्रैफिक और प्रदूषण बहुत ज्यादा होता है। वर्तमान समय में यहां की पार्किंग व्यवस्था अवैध रूप से चल रही है।
यहां स्थिति सुबह और शाम के कुछ घंटों में ज्यादा बिगड़ जाती है और तब जाम के कारण गाड़ियां ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। ऐलावादी ने एनजीटी से अपील की है कि वह डीडीए और दिल्ली सरकार को मल्टीलेवल पार्किंग बनाने के निर्देश दे।
यही एक जरिया है जिससे लोटस टेंपल जैसे मूल्यवान धरोहरों को बचा के रखा जा सकता है। भारत में 1986 में बना यह बहाई मंदिर विश्व में बने सात मंदिरों में से एक है।