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दिल्ली: 2005 में की 20 रुपये की थी बेईमानी, अब नौकरी की बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट ने लगाई मुहर
Sat, 12 Sep 2026 09:15 AM IST
Vijay Singh Pundir
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: Vijay Singh Pundir
Updated Sat, 12 Sep 2026 09:15 AM IST
सार
याचिकाकर्ता सुखपाल सिंह 1998 में डीटीसी में रिटेनर क्रू कंडक्टर के रूप में नियुक्त हुए थे। आरोप है कि 3 दिसंबर 2005 को बस नंबर 5286 पर ड्यूटी के दौरान चेकिंग टीम ने पाया कि उन्होंने दो यात्रियों से 20 रुपये लेकर टिकट नहीं दिया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
डीटीसी के एक कंडक्टर को टिकट बिक्री के दौरान 20 रुपये की बेईमानी की कीमत अपनी नौकरी खोकर चुकानी पड़ी। साल 2005 में हुई घटना के बाद नौकरी की बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट ने 2026 में मुहर लगा दी।
हाईकोर्ट ने डीटीसी के कंडक्टर सुखपाल सिंह की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने मौखिक आदेश में कहा कि जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ और श्रम न्यायालय के फैसले में कोई मनमानी या विकृति नहीं दिखाई देती।
याचिकाकर्ता सुखपाल सिंह 1998 में डीटीसी में रिटेनर क्रू कंडक्टर के रूप में नियुक्त हुए थे। आरोप है कि 3 दिसंबर 2005 को बस नंबर 5286 पर ड्यूटी के दौरान चेकिंग टीम ने पाया कि उन्होंने दो यात्रियों से 20 रुपये लेकर टिकट नहीं दिया। साथ ही सोहना से गुड़गांव के सही किराये से 4 रुपये कम वसूले। उन्हें गबन का दोषी पाया गया और बर्खास्त कर दिया गया।
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श्रम न्यायालय ने 16 जुलाई 2016 के आदेश में जांच को वैध ठहराया और 12 अगस्त 2016 के अवार्ड में बर्खास्तगी को सही माना। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जांच में यात्रियों की गवाही नहीं ली गई, बचाव सहायक नियुक्त नहीं किया गया।
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हाईकोर्ट ने डीटीसी के कंडक्टर सुखपाल सिंह की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने मौखिक आदेश में कहा कि जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ और श्रम न्यायालय के फैसले में कोई मनमानी या विकृति नहीं दिखाई देती।
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याचिकाकर्ता सुखपाल सिंह 1998 में डीटीसी में रिटेनर क्रू कंडक्टर के रूप में नियुक्त हुए थे। आरोप है कि 3 दिसंबर 2005 को बस नंबर 5286 पर ड्यूटी के दौरान चेकिंग टीम ने पाया कि उन्होंने दो यात्रियों से 20 रुपये लेकर टिकट नहीं दिया। साथ ही सोहना से गुड़गांव के सही किराये से 4 रुपये कम वसूले। उन्हें गबन का दोषी पाया गया और बर्खास्त कर दिया गया।
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श्रम न्यायालय ने 16 जुलाई 2016 के आदेश में जांच को वैध ठहराया और 12 अगस्त 2016 के अवार्ड में बर्खास्तगी को सही माना। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जांच में यात्रियों की गवाही नहीं ली गई, बचाव सहायक नियुक्त नहीं किया गया।