{"_id":"6a638fc02790a19a600399a4","slug":"pandharpur-wari-should-be-included-in-unescos-intangible-cultural-heritage-list-dr-sachchidanand-joshi-delhi-ncr-news-c-340-1-del1011-147419-2026-07-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हो पंढरपुर वारी : डॉ. सच्चिदानंद जोशी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हो पंढरपुर वारी : डॉ. सच्चिदानंद जोशी
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली।
सात सौ वर्ष पुरानी पंढरपुर वारी परंपरा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने की मांग तेज हो गई है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान ने इस संबंध में एक अंतरराष्ट्रीय बैठक आयोजित की। इसमें देश-विदेश के राजनयिकों, विद्वानों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने भाग लिया। बैठक आईजीएनसीए परिसर में आयोजित की गई थी। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने पंढरपुर वारी को भारत की सभ्यतागत विरासत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा भक्ति, समानता और सामुदायिक सहभागिता के मूल्यों को जीवित रखती है। डॉ. जोशी ने इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में उचित स्थान दिलाने की बात कही। बैठक में दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष वैभव डांगे भी उपस्थित थे। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ विजय चौथाईवाले और विवेक गर्गे भी शामिल हुए। आईजीएनसीए के डीन प्रो. सुधीर लाल तथा विभिन्न देशों के दूतावासों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
परंपरा का वैश्विक महत्व
कार्यक्रम में पंढरपुर वारी के इतिहास, दर्शन और भक्ति संगीत पर विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं। साहित्य और सामुदायिक परंपराओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी जीवंत विरासतों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना आवश्यक है। इससे उनके संरक्षण और भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के प्रयासों को गति मिलेगी। सभी प्रतिभागियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संकल्प लिया।
विज्ञापन
नई दिल्ली।
सात सौ वर्ष पुरानी पंढरपुर वारी परंपरा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने की मांग तेज हो गई है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान ने इस संबंध में एक अंतरराष्ट्रीय बैठक आयोजित की। इसमें देश-विदेश के राजनयिकों, विद्वानों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने भाग लिया। बैठक आईजीएनसीए परिसर में आयोजित की गई थी। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने पंढरपुर वारी को भारत की सभ्यतागत विरासत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा भक्ति, समानता और सामुदायिक सहभागिता के मूल्यों को जीवित रखती है। डॉ. जोशी ने इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में उचित स्थान दिलाने की बात कही। बैठक में दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष वैभव डांगे भी उपस्थित थे। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ विजय चौथाईवाले और विवेक गर्गे भी शामिल हुए। आईजीएनसीए के डीन प्रो. सुधीर लाल तथा विभिन्न देशों के दूतावासों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
परंपरा का वैश्विक महत्व
कार्यक्रम में पंढरपुर वारी के इतिहास, दर्शन और भक्ति संगीत पर विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं। साहित्य और सामुदायिक परंपराओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी जीवंत विरासतों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना आवश्यक है। इससे उनके संरक्षण और भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के प्रयासों को गति मिलेगी। सभी प्रतिभागियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संकल्प लिया।
विज्ञापन