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खराब हालात ही मानसिक रूप से बनाते हैं मजबूत : प्रो. कुमार
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-मंगलवार को एम्स में मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने दी जानकारी
-इमोशनल हेल्थ और वेलनेस पर हुआ कार्यक्रम, कहा-लोगों से जुड़ना चाहिए
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हम चाहते हैं कि सब कुछ प्लान के मुताबिक हो। कैब समय पर मिले, काम में देरी न हो, ट्रैफिक न मिले, मूड खराब न हो। ये सोच हमें अंदर से कमजोर बनाती है। यह जानकारी एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने दी। उन्होंने कहा कि वेल-बीइंग का मतलब सिर्फ खुश रहना नहीं, बल्कि भावनाओं को समझना, लोगों से जुड़ना, रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को संभालना और कभी-कभी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना भी है।
वह मंगलवार को एम्स में इमोशनल हेल्थ और वेलनेस पर हुए कार्यक्रम में बोल रहे थे। प्रो. कुमार कहते हैं कि मेंटल वेल-बीइंग का रास्ता छोटी-छोटी आदतों से होकर गुजरता है। थोड़ी बेचैनी को स्वीकार करना, खुद को कुछ पल का आराम देना, सोशल कनेक्शन रखना और सोच-समझकर खाना चुनना, ये ही वे कदम हैं जो हमें हर दिन थोड़ा और मजबूत बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। देरी, बोरियत और अनिश्चितता को स्वीकार करना ही हमें इमोशनली स्ट्रॉन्ग बनाता है। वे बताते हैं कि बोरियत को अक्सर नेगेटिव समझा जाता है, जबकि यह दिमाग को रिफ्रेश करने और नई सोच पैदा करने का मौका देती है। बच्चों में यह खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि बोरियत क्रिएटिविटी को जन्म देती है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि हमेशा बिजी रहना सेहत का संकेत नहीं है।
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अपने खाने को दवा की तरह लें
प्रो. कुमार ने कहा कि बहुत से लोग खुद को इतना व्यस्त रखते हैं कि वो अपने अंदर की आवाज, भावनाओं और जरूरतों को पहचान ही नहीं पाते। आगे चलकर यही तनाव का कारण बनता है। अपने खाने को दवा की तरह लें। एक पिज्जा या बर्गर खाकर तुरंत नोटिस करें कि आपका शरीर कैसा महसूस कर रहा है।
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-इमोशनल हेल्थ और वेलनेस पर हुआ कार्यक्रम, कहा-लोगों से जुड़ना चाहिए
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हम चाहते हैं कि सब कुछ प्लान के मुताबिक हो। कैब समय पर मिले, काम में देरी न हो, ट्रैफिक न मिले, मूड खराब न हो। ये सोच हमें अंदर से कमजोर बनाती है। यह जानकारी एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने दी। उन्होंने कहा कि वेल-बीइंग का मतलब सिर्फ खुश रहना नहीं, बल्कि भावनाओं को समझना, लोगों से जुड़ना, रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को संभालना और कभी-कभी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना भी है।
वह मंगलवार को एम्स में इमोशनल हेल्थ और वेलनेस पर हुए कार्यक्रम में बोल रहे थे। प्रो. कुमार कहते हैं कि मेंटल वेल-बीइंग का रास्ता छोटी-छोटी आदतों से होकर गुजरता है। थोड़ी बेचैनी को स्वीकार करना, खुद को कुछ पल का आराम देना, सोशल कनेक्शन रखना और सोच-समझकर खाना चुनना, ये ही वे कदम हैं जो हमें हर दिन थोड़ा और मजबूत बनाते हैं।
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उन्होंने कहा कि जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। देरी, बोरियत और अनिश्चितता को स्वीकार करना ही हमें इमोशनली स्ट्रॉन्ग बनाता है। वे बताते हैं कि बोरियत को अक्सर नेगेटिव समझा जाता है, जबकि यह दिमाग को रिफ्रेश करने और नई सोच पैदा करने का मौका देती है। बच्चों में यह खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि बोरियत क्रिएटिविटी को जन्म देती है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि हमेशा बिजी रहना सेहत का संकेत नहीं है।
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अपने खाने को दवा की तरह लें
प्रो. कुमार ने कहा कि बहुत से लोग खुद को इतना व्यस्त रखते हैं कि वो अपने अंदर की आवाज, भावनाओं और जरूरतों को पहचान ही नहीं पाते। आगे चलकर यही तनाव का कारण बनता है। अपने खाने को दवा की तरह लें। एक पिज्जा या बर्गर खाकर तुरंत नोटिस करें कि आपका शरीर कैसा महसूस कर रहा है।