यूपी-हरियाणा से दिल्ली होकर नहीं गुजरेंगे व्यावसायिक वाहन
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दिल्ली में वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एनएच-एक और आठ के बाद अब राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) -दो, 10 व 58 और राज्य राजमार्ग (एसएच)-57 से आने वाले उन भारी व्यावसायिक वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है जिनका गंतव्य कहीं और है।
जिन भारी व्यावसायिक वाहनों का गंतव्य दिल्ली है वे पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क अदा कर दिल्ली में प्रवेश कर सकते हैं। इससे फरीदाबाद, पलवल, गाजियाबाद और बागपत की तरफ से आने वाले भारी ट्रैफिक पर अंकुश लग पाएगा।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस संबंध में दिल्ली सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को उपयुक्त कदम उठाने केलिए कहा है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अदालत को बताया कि एनएच-एक और आठ से भारी व्यावसायिक वाहनों की एंट्री पर लगी रोक के बाद प्रदूषण में करीब 20 फीसदी की कमी आई है। उन्होंने बताया कि दिल्ली आने के लिए कुल 127 एंट्री प्वाइंट हैं लेकिन इनमें से नौ एंट्री प्वाइंट महत्वपूर्ण है।
31 मार्च के बाद एनसीआर में सिर्फ सीएनजी टैक्सियां
सुप्रीम कोर्ट ने 2000 सीसी से अधिक क्षमता वाली गाड़ियों के पंजीकरण पर 31 मार्च तक लगी रोक को हटाने से इनकार कर दिया है। टोयटा, मर्सिडीज और महिन्द्रा ने अदालत से गुहार की थी कि पंजीकरण पर लगी रोक हटाई जाए क्योंकि इससे उनके बिजनेस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
कार निर्माता कंपनियों की दलील थी कि उनकी कारें कम प्रदूषण करती हैं। उनका कहना था कि इन कारों के इंजन की तकनीक ऐसी है जिससे प्रदूषण कम होता है। इस पर पीठ ने कंपनियों को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि क्या आपकी कारों से ऑक्सीजन निकलता है।
पीठ ने कंपनियों को दस्तावेजों के जरिये यह साबित करने के लिए कहा है कि 2,000 सीसी से अधिक वाले डीजल कारें पेट्रोल वाहनों के बराबर प्रदूषण करती हैं। पीठ ने कंपनियों को चेतावनी दी है कि अगर उनका दावा सही नहीं हुआ तो वे परेशानी में आ सकती हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि 31 मार्च के बाद एनसीआर में सिर्फ सीएनजी टैक्सियां ही चलेंगी। गत 16 दिसंबर के आदेश में यह तारीख एक मार्च थी। अदालत ने इस तारीख में फेरबदल कर 31 मार्च कर दिया है। टैक्सी मालिकों की ओर से पेश वकील ने कहा कि डीजल वाहनों को सीएनजी में तब्दील नहीं किया जा सकता है।
ऐसे में इस फैसले के कारण उन्हें बहुत परेशानी होगी और इसका व्यापक असर पड़ेगा। लेकिन अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही इससे कुछ भी प्रभाव पड़े हम अपने आदेश में किसी तरह का फेरबदल नहीं कर सकते।
31 मार्च तक एनसीआर में लगेंगे और 104 सीएनजी स्टेशन
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने पीठ को बताया कि 31 मार्च तक एनसीआर में 104 सीएनजी स्टेशन लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि इसके लिए जगह की उपलब्धता और इसके लिए लाइसेंस देने समेत कई परेशानियां हैं। लेकिन पीठ ने सरकार को यह सुनिश्चित करने केलिए कहा है कि 31 मार्च तक एनसीआर में 104 सीएनजी स्टेशन शुरू हो जाएं।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 10 वर्ष से पुराने सरकारी डीजल वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। वास्तव में कोर्ट ने सुनवाई केदौरान कहा कि पांच-दस साल पुराने सरकारी डीजल वाहनों को सड़कों से क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि ये प्रदूषण फैला रहे हैं। पीठ ने इस संबंध में सरकार को अपना रुख स्पष्ट करने केलिए कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 1998 केउस आदेश का पालन करने के लिए कहा है जिसमें बसों की संख्या 5,000 से बढ़ाकर दस हजार करने के लिए कहा गया था, जिससे कि यात्रियों को परेशानियों का सामना न करना पड़े। फिलहाल दिल्ली की सड़कों पर डीटीसी की 4,000 बसें चल रही हैं। इसके अलावा 1,500 क्लस्टर बसें चल रही हैं।
सरकार के पास बसों को रखने की समस्या
दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील राहुल मेहरा ने बताया कि सरकार के पास बसों को रखने की समस्या है। उन्होंने कहा कि सरकार को इसके लिए 500 एकड़ जमीन की दरकार है।
इनमें से 45 एकड़ जमीन डीडीए द्वारा उपलब्ध करा दी गई है। बाकी जमीन आवंटित होने के बाद अब तक डीडीए ने उपलब्ध नहीं कराया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सॉलिसिटर जनरल को डीडीए का पक्ष बताने के लिए कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा है कि अगर कोई 10 वर्ष से पुरानी डीजल गाड़ियों या 15 वर्ष से अधिक पुरानी पेट्रोल गाड़ियों को एनसीआर से बाहर बेचना चाहता है तो सरकार एनओसी देने में रुकावट न डाले।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि क्यों न दिल्ली मेट्रो में विशेष कोच हो जहां लोग आराम से बैठे, भले ही उसका किराया सामान्य किराये से पांच गुना अधिक हो। शीर्ष अदालत ने कहा कि महंगी और लग्जरी कार वालों को अगर सार्वजनिक परिवहन की ओर प्रेरित करना है तो उन्हें जगह तो मिलनी ही चाहिए।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरशन को इस पर विचार करने के लिए कहा है। साथ ही पीठ ने इस बात पर भी विचार करने केलिए कहा है कि किस तरह से मेट्रो की आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है।