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मिशन-2022: पिछड़ों को सहेजने की रणनीति बनाने में जुटी भाजपा, जाति विशेष के प्रभावशाली नेताओं पर निगाहें

Sat, 12 Jun 2021 09:20 AM IST
शाहरुख खान सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 12 Jun 2021 09:20 AM IST
सार

भाजपा की निगाह प्रदेश के कई ऐसे नेताओं पर टिकी है, जो किसी जाति विशेष में प्रभावशाली हैं और भाजपा की रीति-नीति के करीब हैं। कोरोना त्रासदी के साए में प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव के नतीजों के मद्देनजर भाजपा को 2022 में फतह के लिए नए सिरे से सियासी बाजी सजाने की जरूरत महसूस हो रही है।

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vidhan sabha election in 2022 BJP started preparing strategy of Mission-2022 BJP engaged in making strategy to save backward
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

पखवाड़े भर से चल रहे कयासों के बीच भाजपा ‘मिशन-2022’ की सियासी चौसर पर विरोधियों को मात देने की रणनीति तैयार करने में जुट गई है। इसके तहत पिछड़ों को सहेजने की कवायद शुरू कर दी गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिल्ली दौरे के बीच भाजपा के सहयोगी अपना दल (एस) की नेता अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद से गृह मंत्री अमित शाह की मुलाकात इसी रणनीति का हिस्सा है। 
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भाजपा की निगाह प्रदेश के कई ऐसे नेताओं पर टिकी है, जो किसी जाति विशेष में प्रभावशाली हैं और भाजपा की रीति-नीति के करीब हैं। कोरोना त्रासदी के साए में प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव के नतीजों के मद्देनजर भाजपा को 2022 में फतह के लिए नए सिरे से सियासी बाजी सजाने की जरूरत महसूस हो रही है। 
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इसके लिए उसकी नजर प्रदेश की आबादी में 55 फीसदी पिछड़ी जातियों को भाजपा के साथ जोड़े रखने पर है। अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद के साथ मुलाकातों का दौर इस कोशिश का हिस्सा है। मोदी सरकार में पहले मंत्री रह चुकी अनुप्रिया इस बार मंत्री नहीं बन पाई हैं। इस कारण वे थोड़ा अनमनी हैं। उन्हें पति आशीष पटेल को भी योगी सरकार में मंत्री न बनाने को लेकर मलाल है। इसी तरह संजय को भी सत्ता में भागीदारी न मिलने की बात कचोट रही है। जिसका उन्होंने दो दिन पहले योगी सरकार पर सवाल उठाकर इजहार भी किया था।
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अनुप्रिया की पहले योगी की मौजूदगी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात और बाद में एकांत में 40 मिनट तक हुई वार्ता को लेकर कहा जा रहा है कि गृहमंत्री ने अनुप्रिया से यूपी में आगामी विस चुनाव में पिछड़ों को साथ बनाए रखने को लेकर गंभीरता से बात की है। वहीं अनुप्रिया ने भी सरकार में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ ही उनके लिए 27 फीसदी की आरक्षण व्यवस्था में बंटवारे के मुद्दे पर भी अपनी राय रखी है। 

इसी तरह निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय की शाह एवं इससे पहले एमएलसी अरविंद शर्मा व भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह से मुलाकात को भी 2022 की चुनावी तैयारी के लिए सहयोगियों को मनाने की कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है। इन्हें मनाने के लिए मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा या अन्य किसी तरह से संतुष्ट किया जाएगा, यह तो आगे पता चलेगा। पर, इतना साफ  हो गया है कि भाजपा इन सहयोगियों को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती है।

इसलिए भी सहेजने की कोशिश
वैसे तो भाजपा के पास अपने खुद के भी कुर्मी, राजभर और निषाद चेहरे हैं, लेकिन वे वह छाप नहीं छोड़ पाए हैं, जिससे इस बिरादरी को लंबे समय तक पार्टी के साथ जोड़ा रखा जा सके। जबकि अनुप्रिया और संजय जैसे चेहरे अपने समाज पर मजबूत पकड़ रखते हैं। 

अनुप्रिया के पिता सोनेलाल पटेल अपने समय के प्रदेश में पिछड़ों में लगभग 8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली कुर्मी बिरादरी के बड़े नेता थे, तो संजय ने निषाद पार्टी बनाकर पिछड़ों में 5 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले निषाद, केवट, मल्लाह, साहनी उपनामों से रहने वाले निषादों को एकजुट करके उन्हें उनकी राजनीतिक हैसियत का एहसास कराया है। 

सामान्य तौर पर देखने पर निषादों का यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन पूर्वांचल में खासतौर से गंगा, राप्ती व सरयू नदियों के किनारे जिस तरह कई जगह इनकी आबादी वोटों की दृष्टि से निर्णायक हो जाती है वह महत्वपूर्ण है। इसी तरह सपा की जातीय वोट गणित की काट के लिए भाजपा के लिए कुर्मी वोट का महत्व बढ़ा देते हैं।

ओमप्रकाश पर भी भाजपा की नजर

सूत्रों के मुताबिक सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर को भी दोबारा साथ लाने की कवायद शुरू हो गई है। इसकी कमान पार्टी के ही एक बड़े पिछड़े नेता को दी गई है। हालांकि ओमप्रकाश भाजपा को ‘डूबती हुई नाव’ बताकर साथ जाने के इनकार कर रहे हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि ओमप्रकाश की जल्द ही मुलाकात शाह से कराई जा सकती है। 2017 के विस चुनाव में भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाले ओमप्रकाश पहली बार विधायक चुने गए और कैबिनेट मंत्री भी बने थे। लेकिन सरकार के खिलाफ खड़े होने से उनको डेढ़ साल के भीतर ही मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था।
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