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प्रत्याशी की घोषणा में जितनी देरी होगी, प्रचार के लिए उतना ही कम समय मिलेगा

Tue, 11 Jan 2022 01:24 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 11 Jan 2022 01:24 AM IST
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The longer the delay in the announcement of the candidate, the less time will be available for campaigning.
ग्रेटर नोएडा। विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 10 फरवरी को दादरी और जेवर में भी वोट डाले जाएंगे। यहां 14 से 21 जनवरी के बीच नामांकन पत्र दाखिल किए जा सकेंगे। इसके बाद भी भाजपा, सपा और कांग्रेस ने अब तक प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो पार्टियों की ओर से प्रत्याशियों की घोषणा में जितनी देरी की जाएगी। उतना ही कम समय चुनाव प्रचार के लिए मिलेगा। समय रहते प्रत्याशियों के नाम की घोषणा से चुनाव में लाभ मिल सकता है। चुनावी दौड़ में पांच प्रमुख पार्टियों के धुरंधरों के बीच टक्कर होनी है। इनमें भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी प्रमुख हैं। वहीं, यदि जेवर से रालोद को सपा का समर्थन मिलता है तो संख्या छह हो जाएगी।
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फिलहाल केवल आम आदमी पार्टी की ओर से प्रत्याशी की घोषणा की गई है। वहीं, बसपा ने विधानसभा प्रभारी बनाए हैं। प्रभारी ही खुद को प्रत्याशी मान रहे हैं। इन दो दलों को छोड़ दें तो बाकी पार्टियों में टिकटों के लिए घमासान मचा है। सूत्रों की मानें तो सपा एक से दो दिन में प्रत्याशी की घोषणा कर सकती है। यहां से करीब 12 दावेदार टिकट की रेस में शामिल हैं। कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों की घोषणा में समय लगने की संभावना है। बताया जा रहा है कि भाजपा के प्रत्याशियों की घोषणा अंतिम समय में होगी। फिलहाल कई दावेदार लखनऊ तक दौड़ लगा रहे हैं। वहीं, कांग्रेस से भी दो विधानसभाओं में 14 उम्मीदवार टिकट की रेस में हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों ने बताया कि प्रत्याशियों की घोषणा में देरी इस वजह से की जाती है कि पार्टी का कोई अन्य दावेदार किसी दूसरे दल में न शामिल हो जाए। या पार्टी में बगावत के स्वर न उठने लगें। हालांकि, इस वजह से प्रचार के लिए पार्टियों को कम समय मिलेगा। इससे नुकसान हो सकता है। फिलहाल, राष्ट्रीय पार्टियां इसी पैटर्न पर चलती आईं हैं।
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रैली पर रोक से भी बढ़ीं मुश्किलें
चुनाव आयोग की ओर से 15 जनवरी तक किसी भी तरह की रैली, पदयात्रा आदि पर रोक लगा दी गई। इससे पार्टियों की परेशानियां बढ़ गई है। यहां वर्चुअल प्रचार के लिए संसाधन जुटाए जा रहे हैं। पहली बार इस तरह की मुसीबत का सामना राजनीतिक दलों के नेता कर रहे हैं।
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