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Noida News: कलियुग में त्रेता का आभास कराएगा राम मंदिर पर लहराता कोविदार ध्वज
Tue, 25 Nov 2025 12:32 AM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
Updated Tue, 25 Nov 2025 12:32 AM IST
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1-राम मंदिर परिसर में लगा कोविदार वृक्ष (फाइल फोटो)
- फोटो : रामपुर मथुरा के दुर्गापुर तौल केंद्र पर खड़ी ट्रालियां।
सतीश पाठक
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर मंगलवार को फहराया जाने वाला कोविदार ध्वज कलियुग में भी त्रेता का आभास कराएगा। यह ध्वज प्राचीन काल से अयोध्या की पहचान रहा है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। मंदिर ट्रस्ट ने इस ध्वज को चुनकर अयोध्या का गौरव बढ़ाया है।
अयोध्या का राज ध्वज और उस पर अंकित कोविदार वृक्ष सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि रही है। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में है। इसके अनुसार चित्रकूट में वनवास के दौरान भगवान राम ने लक्ष्मण को ध्वजों से विभूषित अश्व और रथों से आती हुई सेना की सूचना दी और इसके बारे में पता लगाने को कहा।
इसे देखकर लक्ष्मण ने कहा कि ''''यथा तु खलु दुर्भद्धिर्भरत: स्वयमागत:। स एष हि महा काय: कोविदार ध्वजो रथे।'''' अर्थात् ''''निश्चय ही दुष्ट दुर्बुद्धि भरत स्वयं सेना लेकर आया है। यह कोविदार युक्त विशाल ध्वज उसी के रथ पर फहरा रहा है''''। इसी प्रसंग से जाहिर है कि कोविदार वृक्ष युक्त ध्वज अयोध्या की पहचान और प्राचीन धरोहर रही है। हालांकि, भारतीय मानस पटल से रघुकुल का यह राज ध्वज बिसरा दिया गया था, जिसे रीवा के इतिहासकार ललित मिश्रा ने कई शोध के बाद खोजा है। इसके बाद राम मंदिर ट्रस्ट ने अयोध्या के प्राचीन और गौरवशाली इतिहास के अनुरूप यही ध्वज फहराने का निर्णय लिया है।
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मंदिर परिसर में लगे हैं कोविदार वृक्ष
-प्राण प्रतिष्ठा के समय ही राम मंदिर परिसर में कोविदार वृक्ष लगाए गए हैं, जो इस समय लगभग आठ से 10 फुट के हो चुके हैं। ध्वजारोहण के साथ ही इसके दर्शन भी शुरू होंगे, जो रामभक्तों को अयोध्या के प्राचीन गौरव का आभास कराएंगे। कथाओं के अनुसार कचनार को ही रघुकुल का वृक्ष माना गया था, लेकिन कई शोधों के बाद कोविदार की जानकारी हुई है।
पहला हाइब्रिड प्लांट था कोविदार
शोध के अनुसार हरिवंश पुराण में उल्लेख है कि महर्षि कश्यप ने पारिजात के पौधे में मंदार के गुण मिलाकर इसे तैयार किया था। यह संभवत: पहला हाइब्रिड प्लांट था। यह अभी भी उपलब्ध है। 15 से 25 मीटर तक ऊंचाई वाला यह वृक्ष फूल और फलदार होता है। इसमें बैगनी रंग के फूल खिलते हैं, जो कचनार के फूल जैसे होते हैं। इसका फल स्वादिष्ट और पौष्टिक माना जाता है। मंदिर बनने के बाद इस ध्वज को पुन: महत्व मिल रहा है, जो एक नए युग की शुरुआत का संकेत है।
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अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर मंगलवार को फहराया जाने वाला कोविदार ध्वज कलियुग में भी त्रेता का आभास कराएगा। यह ध्वज प्राचीन काल से अयोध्या की पहचान रहा है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। मंदिर ट्रस्ट ने इस ध्वज को चुनकर अयोध्या का गौरव बढ़ाया है।
अयोध्या का राज ध्वज और उस पर अंकित कोविदार वृक्ष सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि रही है। इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में है। इसके अनुसार चित्रकूट में वनवास के दौरान भगवान राम ने लक्ष्मण को ध्वजों से विभूषित अश्व और रथों से आती हुई सेना की सूचना दी और इसके बारे में पता लगाने को कहा।
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इसे देखकर लक्ष्मण ने कहा कि ''''यथा तु खलु दुर्भद्धिर्भरत: स्वयमागत:। स एष हि महा काय: कोविदार ध्वजो रथे।'''' अर्थात् ''''निश्चय ही दुष्ट दुर्बुद्धि भरत स्वयं सेना लेकर आया है। यह कोविदार युक्त विशाल ध्वज उसी के रथ पर फहरा रहा है''''। इसी प्रसंग से जाहिर है कि कोविदार वृक्ष युक्त ध्वज अयोध्या की पहचान और प्राचीन धरोहर रही है। हालांकि, भारतीय मानस पटल से रघुकुल का यह राज ध्वज बिसरा दिया गया था, जिसे रीवा के इतिहासकार ललित मिश्रा ने कई शोध के बाद खोजा है। इसके बाद राम मंदिर ट्रस्ट ने अयोध्या के प्राचीन और गौरवशाली इतिहास के अनुरूप यही ध्वज फहराने का निर्णय लिया है।
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मंदिर परिसर में लगे हैं कोविदार वृक्ष
-प्राण प्रतिष्ठा के समय ही राम मंदिर परिसर में कोविदार वृक्ष लगाए गए हैं, जो इस समय लगभग आठ से 10 फुट के हो चुके हैं। ध्वजारोहण के साथ ही इसके दर्शन भी शुरू होंगे, जो रामभक्तों को अयोध्या के प्राचीन गौरव का आभास कराएंगे। कथाओं के अनुसार कचनार को ही रघुकुल का वृक्ष माना गया था, लेकिन कई शोधों के बाद कोविदार की जानकारी हुई है।
पहला हाइब्रिड प्लांट था कोविदार
शोध के अनुसार हरिवंश पुराण में उल्लेख है कि महर्षि कश्यप ने पारिजात के पौधे में मंदार के गुण मिलाकर इसे तैयार किया था। यह संभवत: पहला हाइब्रिड प्लांट था। यह अभी भी उपलब्ध है। 15 से 25 मीटर तक ऊंचाई वाला यह वृक्ष फूल और फलदार होता है। इसमें बैगनी रंग के फूल खिलते हैं, जो कचनार के फूल जैसे होते हैं। इसका फल स्वादिष्ट और पौष्टिक माना जाता है। मंदिर बनने के बाद इस ध्वज को पुन: महत्व मिल रहा है, जो एक नए युग की शुरुआत का संकेत है।