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बच्चों के घर सकुशल लौटने पर परिजनों की आंखों से छलके आंसू

Sat, 05 Mar 2022 11:05 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 05 Mar 2022 11:05 PM IST
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Tears spilled from the eyes of the family after the children returned home safely
पलवल। यूक्रेन में फंसे छात्रों की घर वापसी जारी है। शुक्रवार शाम तक भी पलवल जिले के करीब 20 विद्यार्थी लौट आए हैं। प्रशासन की माने तो 83 में से 75 के करीब छात्र लौट आए हैं। यूक्रेन से सकुशल लौट रहे छात्रों से उनके परिजन व आसपास के लोग उनके वहां से निकलने तथा युद्ध के दौरान फंसे होने के बीच की आपबीती भी सुन रहे हैं। साथ ही भारत के उन सभी लोगों तथा छात्रों के लिए प्रार्थना की, जो अभी भी यूक्रेन में फंसे हैं। उधर, होडल गढ़ी पट्टी निवासी सौरभ व होडल की सैनिक कालोनी निवासी मन्नू के यूक्रेन में सूमि विश्वविद्यालय में ही फंसे होने पर उनके परिजन बेहद चिंतित है तथा प्रशासन से अपने बच्चों को सुरक्षित लाने की गुहार लगा रहे हैं। परिजन शनिवार को स्थानीय अधिकारियों से भी मिले।
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28 फरवरी को पार किया था बॉर्डर
यूक्रेन से लौटे हथीन उपमंडल के गांव भमरोला जोगी के साहिल सहरावत व खिल्लूका गांव के इकराम के सकुशल लौटने पर उनके परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। गांव भमरोला जोगी निवासी साहिल सहरावत नेशनल पिरगोव मेडिकल यूनिवर्सिटी में पांचवें साल का छात्र है। उनका कहना है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ 28 फरवरी को यूक्रेन का बॉर्डर पार कर रोमानिया में प्रवेश किया था। वे साला स्पोर्ट्स कैम्प 155 पातुरी में रहे। वे रोमानिया के सालेशा एयरपोर्ट से दिल्ली आए। दिल्ली पहुंचने पर उसके पिता राजवीर, माता महरवती और परिवार के अन्य सदस्यों ने रिसीव किया। साहिल सहरावत का कहना है कि भारत सरकार ने उनके लाने की जो व्यवस्था की है वह सराहनीय है।
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सात लाख रुपये खर्च करके पहुंचे
गांव खिल्लुका का इकराम भी रोमानिया के रास्ते यूक्रेन से लौटा है। इकराम ओडेसा नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में पांचवें साल का छात्र है। उसने बताया कि वहां के हालात गंभीर होते देख उन्होंने 24 फरवरी को दूतावास से संपर्क किया तो उनको कहा गया कि वे उनको निकालने के लिए प्रयास करेंगे और हॉस्टल से ही ले लेंगे। यूक्रेन दूतावास ने कोई प्रबन्ध नहीं किया। उन्होंने यूक्रेन से खुद ही निकलने का फैसला लिया। हॉस्टल से रोमानिया बॉर्डर तक के लिए छात्रों ने अपने स्तर पर सात लाख रुपये में बस कर ली। रोमानिया बॉर्डर तक पहुंचने में आठ किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। वहां माइनस छह डिग्री तापमान था। बॉर्डर से बुखारेस्ट तक पहुंचने में काफी समय लगा। उनके पास तिरंगा नही था। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर तिरंगे बनाए। उनकी माता भूरी बेगम का कहना है कि वे सब खुश हैं।
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