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UP: 31 साल पहले 1575 के मनीऑर्डर गबन में उप डाकपाल को तीन साल की कैद, नोएडा के डाकघर में तैनात था दोषी
Mon, 03 Nov 2025 07:15 AM IST
विजय पुंडीर
मोहम्मद बिलाल, अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा
मोहम्मद बिलाल, अमर उजाला, ग्रेटर नोएडा
Published by: विजय पुंडीर
Updated Mon, 03 Nov 2025 07:15 AM IST
सार
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम-1) मयंक त्रिपाठी की अदालत ने सुनवाई करते हुए हापुड़ के पिलखुआ की कश्यप काॅलोनी निवासी महेंद्र कुमार को आईपीसी की धारा-409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) और धारा-420 (छल) के अपराध में दोषी करार दिया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
नोएडा के सेक्टर-19 डाकघर में करीब 31 साल पहले 1,575 के मनीऑर्डर के गबन मामले में कोर्ट ने उप डाकपाल को तीन साल की सजा सुनाई है। साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना जमा नहीं करने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
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अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम-1) मयंक त्रिपाठी की अदालत ने सुनवाई करते हुए हापुड़ के पिलखुआ की कश्यप काॅलोनी निवासी महेंद्र कुमार को आईपीसी की धारा-409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) और धारा-420 (छल) के अपराध में दोषी करार दिया।
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अभियोजन के अनुसार, 12 अक्तूबर, 1993 को अरुण मिस्त्री निवासी सेक्टर-15 नोएडा ने 1,500 का मनीऑर्डर अपने पिता मदन महतो के नाम समस्तीपुर (बिहार) भेजा था। आरोप था कि उपडाकपाल ने मनीऑर्डर की राशि 1500 और कमीशन 75 सहित कुल 1575 रुपये लिए लेकिन सरकारी खाते में जमा नहीं किया। जाली रसीद जारी कर मनीऑर्डर भेजने वाले को दे दी। जब मनीऑर्डर प्राप्तकर्ता को राशि नहीं मिली तो अरुण मिस्त्री ने 3 जनवरी 1994 को डाक अधीक्षक सुरेश चंद्र से शिकायत की थी।
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कोर्ट बोला - सरकारी सेवक से सर्वोच्च ईमानदारी और निष्ठा की अपेक्षा की जाती है
अदालत अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन ने महेंद्र के खिलाफ आरोपों को युक्ति-युक्त संदेह से परे सिद्ध किया है। सरकारी सेवक से अपेक्षा की जाती है कि वह सर्वोच्च ईमानदारी और निष्ठा से काम करे। इस प्रकार के अपराध न केवल सरकारी तंत्र को कमजोर करते हैं बल्कि जनता के विश्वास को भी आघात पहुंचाते हैं। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले राम शंकर पटनायक बनाम ओडिसा राज्य (1988) का हवाला देते हुए कहा कि एक बार आपराधिक न्यासभंग का अपराध सिद्ध हो जाने पर बाद में धनराशि लौटाने से अपराध समाप्त नहीं होता। धनराशि की वापसी केवल सजा निर्धारण के समय विचारणीय हो सकती है। एक मात्र गवाह का साक्ष्य भी पर्याप्त है यदि वह विश्वसनीय और सुसंगत हो।
धनराशि जमा करके मांगी थी माफी
विभागीय जांच में यह पाया गया था कि रसीद नकली थी और उस पर अंकित धनराशि सरकारी खाते में जमा नहीं हुई थी। महेंद्र ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए 8 फरवरी 1994 को 1,575 राशि डाक विभाग में जमा की और लिखित में कहा था कि यदि आगे भी ऐसी कोई घटना सामने आती है तो वह संबंधित धनराशि जमा करेगा। डाक अधीक्षक ने मामला थाना सेक्टर-20 नोएडा में दर्ज कराया था जिसके आधार पर मुकदमा पंजीकृत हुआ था। विवेचना के बाद पुलिस ने महेंद्र कुमार के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया था। 5 जनवरी 2001 को महेंद्र आरोप तय किए गए।जिनका उसने खंडन करते हुए स्वयं को निर्दोष बताया। डाक अधीक्षक व गवाह सुरेश चंद्र ने कहा कि मनीऑर्डर की रसीद जाली पाई गई थी और धनराशि का कोई हिसाब सरकारी रिकार्ड में नहीं था। महेंद्र ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए गबन की राशि विभाग में जमा की थी।
सजा सुनाते समय अदालत ने यह कहा...
सजा सुनाते समय अदालत ने आरोपी की सेवा के लंबे इतिहास और उसके परिवार की स्थिति को ध्यान में रखा लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि लोक सेवक से कानून का सम्मान करने की अपेक्षा और अधिक होती है। अदालत ने प्राचीन विधि शास्त्री मनु के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया जिसमें दंड को प्रजा का रक्षक बताया गया है।